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Save Humanity to Save Earth" - Read More Here


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Thursday, March 12, 2015

बेटियाँ

बेटियाँ जिद्दी होती ही हैं। 
हर पिता के लिए। 
क्योकि वही तो वे कर सकती हैं जिद। 
और उसे पूरी भी। 
और जब तुतला के वो गर माँगती भी है सितारे। 
कोई पिता असमर्थ नहीं होता। 
फड़फड़ाने देता हैं बेटी को अपने पंख। 
ताकि ऊची उड़ान भर सके। 
खुद जाके अपना आसमान ले आये। 
फिर एक दिन, चिड़िया उड जाये। 
किसी नए आसमान की तलाश में। 

पिता जानता हैं। 
बेटी की जिद। 
जिद नहीं होती। 
हौसलों की उड़ान होती हैं। 

और बेटी जानती हैं। 
उसकी जिद पूरी करना। 
पापा का तरीका हैं। 
प्यार जताने का। 

कुछ रिश्ते ऐसे होते ही हैं। 
जिन्हे शब्दों में पिरोया नहीं जाता। 
बस, गले लगाया जाता हैं। 

बेटियाँ जिद्दी होती ही हैं। 
हर पिता के लिए। 

Monday, March 2, 2015

शून्यता


शून्य का अपना कोई मतलब नहीं होता। 
यही उसकी बैचैनी भी हैं। 
खोजता हैं आदमी इसीलिए।
अपने होने का अर्थ। 

कभी प्रकति, कभी लोगो से। 
बनाता हैं रिश्ते, करता हैं प्रेम।  
खुद को लुटाता हैं। 
शायद दो शून्य मिलकर। 
शून्य से कुछ ज्यादा हो जाये। 

जैसे कृष्ण - राधा। 
जैसे शिव - सती। 
एक दूसरे के बिना। 
अधूरे से। 

तुम गणित में मत उलझना। 
शून्य और शून्य मिलकर। 
शून्य नहीं होता,
जिंदगी में। 

उसे पूर्ण कहते हैं। 

एक शून्य तलाश करता हैं। 
अपने माने, पाने की। 
पूर्ण होने की। 
फिर, बुद्ध हो जाता हैं।  
यही जीवन यात्रा हैं। 

Sunday, January 18, 2015

कितनी निर्दयी हो तुम.
















कभी रेत के मानिंद, मुट्ठी से फिसलती हो।
कभी गले लगाती हो।
कितनी निर्दयी हो तुम.
ऐ जिंदगी, क्यों सताती हो.

तुम माशूक की तरह हो।
सामने होती हो, वक्त को अक्सर रोक देती हो।
कोई गम नहीं, जब साथ नहीं।
टीस तब उठती हैं, जब तुम याद आती हो.

कितनी निर्दयी हो तुम.
ऐ जिंदगी, क्यों सताती हो.

बसंत की अंगड़ाई लेती दोपहर।
दूर कही, रेडियो पर, कोई गजल।
हवा का छु कर गुजरना।
और पत्तियों की सरसराहट।
दिल बैठ सा जाता हैं।
वक्त को थाम लेने का मन करता हैं।
पर रूकती कहा हो तुम।
बीतती जाती हो।

कितनी निर्दयी हो तुम.
ऐ जिंदगी, क्यों सताती हो.

-राहुल

Saturday, July 12, 2014

सिकंदर चला गया.

जबसे लोगो की आँखों से, पानी चला गया.
बरसा नहीं बादल, खाली चला गया.

रहनुमा की उम्मीद में बैठे हैं सभी.
आया नही अभी तक, कहा चला गया?

वो बेफिक्री, वो आशिकी, वो पागलपन।
हर साँस थामा मगर,वो वक्त चला गया.

ये दौड़ हैं अंधी, एक खेल के मानिंद।
मजा क्या अब इसका, वो बच्चा चला गया.

तुझे नाज है, दौलत का, ठीक हैं नदीम।
देख, अभी-अभी, खाली हाथ, सिकंदर चला गया.

जबसे लोगो की आँखों से, पानी चला गया.
बरसा नहीं बादल, खाली चला गया.

आज इतना ही.
राहुल

Saturday, May 10, 2014

मनुष्य मर रहा हैं.

भावनाओ को , कुछ अहसांसो को.
दे देता हैं, मानव, कोई  शब्द।
फिर घिसता जाता हैं उन्हे।
समय के पत्थर पर.

शब्द खोते जाते हैं, अर्थ अपना।
और साथ ही होती हैं दफ़न.
वो भावनाए, वो अहसास।

और हाड़ मांस का पुतला
बनता जाता है मशीन।
मशीन जिसे शब्दों कि सिर्फ़ ध्वनि पता है.
नहीं पता, उन्हें निभाने के मायने
उनके आगे पीछे छिपी, अहसांसो कि गर्माहट।
उनकी रूहानियत की खुशबू।

ईश्वर उदघोषणा करता सा लगता है.
"मनुष्य मर रहा हैं."

Tuesday, December 31, 2013

फ़ारूक शेख: ठहराव और संजीदगी.

"फिर छिड़ी रात बात फूलों की" । रेडियो पर सायमा RJ Sayema ने जब ये गाना बजाया, मेरे तो सारे तार बज से गए.।
फारूक साहब चले गए. उनकी अदायगी एक ठहराव देती थी. मानो समय इसी पल में जम गया हो. आज तकनीक तो बहुत उन्नत हैं, लेकिन अदाकारों में एक जल्दीबाजी सी लगती हैं. एक दौड़ जो पहुचाती कही नहीं। सोने पे सुहागा मुहावरा अपना अर्थ पाता हैं, जब जगजीत & तलत अज़ीज़, फारूक के लिए गाते हैं। मानो एक ठहराव दूसरे कि तलाश में निकला था और वो पूरी हुई.

सायमा ने दीप्ती जी बात की. बहुत बहुत गहरी उदासी थी. जिंदगी का आधा हिस्सा अचानक अलग हो जाये, तो फिर आधे बचे का क्या वजूद। बातो के दौरान ही यह बात निकल कर आई कि, फारूक साहब को पोएट्री , उर्दू शायरी का काफी शौक था. और इसे मै साहित्य & समाज की बहुत बड़ी  क्षति कहूंगा कि, फारूक साहब शायरी पर ही एक बहुत खूबसूरत प्रोग्राम लेकर आने वाले थे. और ख़ुदा से ये गुनाह हो गया.

वो संजीदगी, ठहराव, एक तीव्र गहरापन। जिंदगी अपने मायने पाती थी और इसीलिए मासूमियत, भोलापन, सहजता & स्नेह के दैवीय गुण तब के इंसानो में होते थे. अब? बोन्साई, उथलापन, भीड़ & एक अंधी दौड़. सब दौड़ रहे, पहुच कोई नहीं रहा.

ख़ुदा उन्हें जन्नत नसीब करे.उस "ठहराव" को सुनते हैं.

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फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात हैं या बरात फूलों की

फुल के हार, फुल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की

आप का साथ, साथ फूलों का
आप की बात, बात फूलों की

फुल खिलते रहेंगे दुनियाँ में
रोज निकलेगी, बात फूलों की

नज़ारे मिलती है, जाम मिलते है
मिल रही है, हयात फूलों की

ये महकती हुयी गज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में, रात फूलों की


Saturday, August 10, 2013

मेरी कविता, मेरा परिचय.

कुछ आस, कुछ निरास,
कुछ बुझी, बुझी सी प्यास,
कुछ विश्वासों के ढहने की टीस,
कुछ, न मिल पाने की खीज।
कुछ खुशबू, कुछ काटे
कुछ दूसरो से मिले, कुछ अपनों ने भी बांटे।
कुछ मेरी, कुछ तेरी कहानी
कुछ खरा - खारा सा पानी।
एक अनमने, मासूम बच्चे से दिल की
जीवन से आपाधापी।
मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।

मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।

Monday, June 24, 2013

मेरे ख्वाब.

तुझे देखता रहू , 
या सांसो की डोर थामे रहु. 
न देखा, तो क्या जी पाउँगा।
देखता रहा, सांसे न ले पाउँगा।
कौन है तु.

तू  शायद, अलसुबह देखा ख्वाब हैं,
जो इतना सच्चा लगता हैं 
कि साँसे रोक देता हैं।
लगता है वही जीना, जीने लायक हैं।
लेकिन जब टूटता है,
तो फिर साँसे रोक देता हैं।

फिर भी मैं, अपने अन्दर के बच्चे को समझाता हूँ.
ख्वाब एक ख्वाब ही तो है. 
ख्वाब ही रहा होगा। 
और जीते चला जाता हूँ।
बहता और बीतता रहता हूँ।
लेकिन जब कभी थोड़ी सी भी फुर्सत मिलती हैं 
मेरे ख्वाब तुम बहुत याद आते हो. 
तुम मुझे  बहुत याद आते हो...  

Friday, March 29, 2013

मेरे आंसू - तेरे दोहे.


शुक्रगुजार हूँ, निदा साहब का। अलसुबह देखे एक ख्वाब का, सुबह पानी पिने आई गौरेया का। सुबह से ही सावन बरस रहा हैं। और रिमझिम नहीं, धुआधार बरस रहा हैं। बाबा कबीर कह ही गए हैं, "कबहि कहु जो मैं किया, तू ही था मुझ माहि।" तो कुछ दोहे भी कागज पर स्याह बन उतर आये।
दर्द और आंसुओ का अस्तित्व से सीधा संवाद होता हैं। कोई मीडिएटर नहीं चाहिए। लेकिन उसके लिए एक गहरी सवेंदंशिलता चाहिए। आज सवेंदना सरस्वती के सामान सुख गई हैं, और इश्वर मर चूका हैं, का उदघोष-सन्देश समाज साफ साफ़ दे रहा हैं। तो बात सीधी हैं, अब उसे किसी बोद्धिक सम्भोग की चाह में , जटिल किया जाये, तो परिणाम भी अनसुलझा छिन्न भिन्न समाज होगा।

खैर। फिर से शुक्रिया, उन बादलो का जो सावन लेके आये।
_______________________________________________________
थोडा नमकीन पानी और फिर बची राख।
साहूकार ने लगाया, जब आदम का हिसाब।

हिसाब किताब में कब समाया तेरे मेरा प्यार।
साहूकार चूक गया, यादे - सांसे - वक्त- गर्मी - ख्वाब।

खुदा तेरी इक दुनिया हैं, एक मेरी भी दुनिया हैं।
तेरी दुनिया भय की, मेरा, प्यार रुआब।

किसने बनाये परिंदे, ये जंगल, जानवर, पानी।
किसी किसी आदम को ही मिलता, इन्सां का ख़िताब।

पीने वाले मधुशाला जाने, पढने वाले पढ़ पाते हैं,
एक खारा - खरा -गीला पन्ना, मेरी जीवन कोरी किताब।

थोडा नमकीन पानी और फिर बची राख।
साहूकार ने लगाया, जब आदम का हिसाब।

-आज इतना ही।

Monday, March 11, 2013

पानी केरा बुलबुला


निर्गम अनजान बीहड़ में कही
एक अनघड जंगली फ़ूल
सोचता हूँ कितनी होंगी
उसकी महत्वकांछाये!

अरबो की भीड़ में
मिटटी का पुतला, अदना इन्सान
अगले पल एक मांस पेशी धडकी
साँस आई और गई, तो जिया।
फिर भी कितने सपने
कितनी आकांछाये !

दोनों दो पल के।
फिर गिर जाना हैं।
आदम क्यों नहीं समझता
उसे भी जाना हैं।

विडम्बना ये हैं
मुरझाने से पहले
वो फूल तो खिलता हैं।
महकता हैं।
सार्थक होता हैं
किन्तु जाने से पहले
आदम, इन्सान नहीं बन पाता हैं।
दुसरे की आँखों से जीता
क्यों नहीं खिल पाता हैं।

नम पलके लिए, सोचता हूँ.
आदम, क्यों नहीं खिल पाता  हैं।

Wednesday, February 27, 2013

समय के दामन से कुछ कुछ मेरा सा। भाग - 1



पुरे 2 साल। और जहा रहा उस घर के सामने ही एक बोर्ड "ओशो समवेत ध्यान केंद्र ". रोज सोचता चल दू उस राह पर और पहूच जाऊ वहा . वर्ष 1993, उषानगर के उस घर की खिड़की से रोज, वह राह ताका करता था। ऐसा लगता था, वो निमंत्रण दे रही हैं।
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।

दादाजी की एक किताब ("समाजवाद से सावधान") ने तो ओशो से परिचय करीब 14 साल की  उम्र में करा दिया था। धार जिले के उस छोटे से गाँव में , मेरी अपनी छोटी सी दुनिया बसती थी। सामने पाठशाला, घर,मैदान, कुछ मित्र  और ढेर सारी किताबे, बस यही थी मेरी दुनिया। अचानक दादाजी का कुछ सामान देखते - संभालते समय, वो किताब मिली। लेखक/कथाकार  थे ओशो रजनीश। गलती से, पहला पन्ना पढ़ लिया, फिर क्या था। आखरी पन्ने तक कुछ सुध न रही। शायद उस उम्र में इतना आसान हुआ करता था, ध्यान में जाना।

खैर, उषानगर में हिम्मत न हुई तो मास्टर ने पुरे 6 साल बाद बुलाया। वर्ष 1999, बढ़ी हिम्मत करके बंशी ट्रेड सेण्टर पंहुचा। याद नहीं किससे मिला। उन्होंने शाम 8 बजे को ध्यान शिविर में आने को कहा। बहुत शर्मीला, शायद ही कुछ बोलने में यकीं रखने वाला, अपनी दुनिया अपनी मस्ती। ये था मैं तब। शर्मीलापन तो हद दर्जे का था। गाँव में कोई सहपाठी मित्र गर लड़की हैं और वो मिलने पहुच जाये, तो मैं पीछे दरवाजे से बाहर।  

खैर, तो मैं बात कर रहा था , मेरे प्रथम ध्यान शिविर से परिचय की। निश्चय किया, आज तो ध्यान शिविर में जाऊंगा ही। हिम्मत करके ध्यान हाल के बाहर पंहुचा भी। अन्दर देखा तो, दिल सीने से बाहर। ये जगह तो अपने लिए हैं ही नहीं बॉस। रंगीन प्रकाश में  नाचते, चीखते लड़के लडकिया। तौबा, उलटे पैर दौड़ लगाई। निचे आया तो पसीने पसीने था। जान बची तो लाखो पाए। लेकिन क्या पता था, लाखो लुटा के आया था।

ओशो ने दूसरी बार भी नहीं आने दिया, तैयार जो नहीं था। या पता नहीं, मेरा ही दुर्भाग्य।

और जब फिर आया पुरे 2 वर्ष बाद, तो जीवन ने अपनी पाठशाला में कड़वे पाठ पढ़ा दिए थे। वही मूल प्रश्न "To be or not to be" सामने था।...खैर बाकि बाते कभी बाद में। लेकिन देर तो हो ही गई थी।

आज इतना ही।

Monday, October 15, 2012

वक्त

वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं.
जो लिखे नहीं, खाली रह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं.

आंधीया तो गुजरी हैं, मेरे भी घर से.
कुछ चिराग हैं, फिर भी जले रह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

मैने तो कुछ पन्ने सिर्फ काले किये.
वो खुदा ही हैं, जो कुछ कह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

बड़ी मुद्दत के बाद ये यकीं हुआ हैं.
पराये शहर में, अपने भी मिल जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

यु ही फिर, जिन्दंगी की किताब पूरी होती जाती हैं.
कुछ पन्ने लेकिन गुलाब रख, खाली भी छोड़े जाते हैं. 
वक्त के पन्ने उड़ते........

और शब्दों  में तुम किताबो के मायने देख,  चुक न जाना.
तथागत, गंध अपनी, कोरे पन्ने पे छोड़ जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

तुझसे इश्क करू या रंजो गम करू ए जिन्दंगी.
कुछ रिश्ते, अजनबी बन भी निभाए जाते हैं.

वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं.
जो लिखे नहीं, खाली रह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं....


आज इतना ही.
राहुल 

Sunday, June 17, 2012

पिक्चर अभी बाकि हैं मेरे दोस्त...

एक पल में जिन्दगी बदलने की ताकत होती हैं. हमारी जिन्दगी अगले पलो में कैसी होगी, चलिए देखते हैं... जिन्दगी का ड्रामा अनवरत गतिमान हैं...

कहते हैं जिन्दगी में कही कोई मंजील नहीं हैं, वरन जिन्दंगी सफ़र का नाम हैं. सुना यह भी हैं कि भगवान जिंदगी रहते, इसीलिए कभी किसी को नहीं मिलता, क्योकि मिल जाये तो फिर क्या? फिर अगले पल का क्या उपयोग? रविंद्रनाथ ने इस पर बहुत खुबसूरत लिखा हैं, बन्दे कि नेक नियत से खुश हो ईश्वर ने उसे अपने पास बुलाया. वो पहुच भी गया द्वार तक, पर दस्तक देने से पहले सिहर गया. पूरी उम्र जिसकी चाहत में गुजरी, वो मिल जाये, फिर क्या? वो लौट आया, और अवाम से वहा पहुचने का रास्ता बताने लगा. शायद बुद्ध भी इसीलिए आये. 

शायद इसीलिए कहते की समाधि और ध्यान एक शाश्वत अ-समय और अ-स्थान अनुभव हैं. उस पल आप ब्रम्हांड से एकाकार हैं. फिर कोई यात्रा नहीं. फिर कोई नया सफ़र नहीं. फिर कोई दर्द नहीं, फिर कोई शायद ख़ुशी भी नहीं.

तो अगर कोई ख्वाहिश बाकि हैं, अगर कोई आरजू दिल में धड़कती हैं, अगर कुछ और पाना हैं,  तो फिर जिन्दगी का सफ़र जारी हैं. पिक्चर अभी बाकि हैं मेरे दोस्त...:-)

Love 
Rahul

Sunday, April 29, 2012

बसंत के मायने: तब और अब.

बसंत के मायने क्या वक्त और स्थान बदल देता हैं? कभी किसी मासूम  उम्र में, फूलों की सुवास प्रिय से आती लगती हैं., और अब पतझड़ की चिंता उस सुगंध  को आत्मा तक नहीं पहुचने देती, और टेसू के फूल का रंग, परिस्थितियों से संघर्ष और उससे उपजी बेबसी से बरसते खून के आंसू से सुर्ख लाल प्रतीत होता हैं..इंसानों में रीतता आँखों का पानी और गिरता जल स्तर, कही कोई सम्बन्ध हैं? पता नहीं. आज व्यवस्था बहुत बड़ी हो चुकी हैं, और इन्सान अदना. व्यवस्था भूल गयी कि उसे इस सामान्य इन्सान के लिए ही बनाया गया हैं, और नियमो के निम्नतर अर्थो  में उलझी हैं. वही अदने इन्सान ने भी वक्त के साथ अपने वजूद को बेच पेट भरने का निश्चय कर लिया हैं. दोनों अपना अर्थ खो रहे हैं, और किसी बोस, सरदार, गाँधी का इंतजार व्यर्थ हैं, क्योकि उन्हें आँखों के पानी वाले इन्सान मिले थे. निराश तो हूँ, लेकिन क्या करू, ब्लड ग्रुप बी+ मिला हैं, तो खून के साथ न्याय जरूर करूँगा. मेरी अदनी सी कोशिश और प्रयोग जारी हैं, पिछले बरस "सच बोलने का प्रण लिया था", और बहुत जूते पड़े थे. Dell कार्नेगी आज भी मौंजू हैं (तारीफ करो और काम निकालो)  और सत्य पराजित. क्योकि सत्य आज outdated हैं, ओल्ड fashioned हैं, झूठ और फरेब, आज के नए बिज़नस मंत्रा हैं. हर कोई एक दुसरे को गंजा समझ, कंघा बेचने में, अपना सब कुछ बेच चूका हैं जो अमूल्य था और सिकन्दर को भूल गया हैं, जिसने अपनी अंतिम यात्रा मैं, खाली हाथ बाहर रखवाए थे...जब सिकंदर भी खाली हाथ गया......तो ....
खैर वक्त के उस दौर कि कुछ पंक्तिया याद आ रही थी, तो सोचा इस मौन को तोडा जाये, जो मेरी इस बरस का प्रण हैं. मौन, लेकिन सार्थक मौन, ख़ामोशी नहीं जो इस देश के सरदार ने अख्तियार कर बेडागर्क  कर दिया हैं. और एक अधेड़ होता इन्सान जिसके पास  देश को परिवर्तित  का पॉवर हैं, किन्तु अपने को किसी प्रदेश  में साबित करने के अपनी जिद के पीछे , देश का इतना मूल्यवान समय जाया कर रहा हैं. 

खैर..अब उस बसंत को याद किया जाये, जब जमाना, पैरो कि ठोकर पे रहता था..और हम, हम आसमां में.:-)
_____________प्यार एक मौन.____________________________________________
हर पल तेरी यांदो का साया साथ हैं.
करू भले ही इंकार, लेकिन कुछ  बात हैं.
वरना क्यों हो जाता हूँ खामोश मैं, भरी महफ़िल में?
जब तेरा नाम किसी के लब से निकलता हैं.
वरना क्यों जब राह में, नहीं होता हैं तेरा साथ.
तो राह में पड़े पत्थरो, मैं पैरो से मारता चलता हूँ.
वरना क्यों, जब तू आती हैं सामने
तो ये दिल जोरो से धडकता हैं.
करना तो चाहता हूँ, हजारो बातें.
पर एक शब्द तक नहीं निकलता हैं.
कुछ बात हैं, हा जरूर कुछ बात हैं.
शब्द जिसे नहीं कर सकते अभिव्यक्त, वो ऐसी कुछ खास हैं.
शायद मौन ही उसकी अभिव्यक्ति का उपाय भला हैं.
जिसे हम-तुम ने प्यार नाम दिया हैं...
जिसे हम-तुम ने प्यार नाम दिया हैं............

आज इतना ही.

Sunday, October 9, 2011

समुंद समाना बूंद में.


********समुंद समाना बूंद में.****************

बड़े गहरे अर्थ छुपे,छोटी छोटी बातों में.
दूर गगन के तारें दिखते, काली-गहरी रातों में.
बड़े गहरे अर्थ छुपे,छोटी छोटी बातों में.....

कौन कहता, कुछ नया.
क्या रहा कुछ अनकहा?
मतलब वही, सिर्फ शब्द नया.
बात सुनने की हैं, गुनने की हैं.
और मौन में मथने की हैं.
जिन्दंगी का ग़र समझा तो,
चुटकुले पे हँसने की हैं.
क्या गीता, क्या कुरान?
बहते सब, तेरे ही अहसासों में.

बड़े गहरे से अर्थ छुपे,छोटी छोटी बातों में.
दूर गगन के तारें दिखते, काली-गहरी रातों में....

आज इतना ही.
प्यार.
राहुल.