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Saturday, May 10, 2014

मनुष्य मर रहा हैं.

भावनाओ को , कुछ अहसांसो को.
दे देता हैं, मानव, कोई  शब्द।
फिर घिसता जाता हैं उन्हे।
समय के पत्थर पर.

शब्द खोते जाते हैं, अर्थ अपना।
और साथ ही होती हैं दफ़न.
वो भावनाए, वो अहसास।

और हाड़ मांस का पुतला
बनता जाता है मशीन।
मशीन जिसे शब्दों कि सिर्फ़ ध्वनि पता है.
नहीं पता, उन्हें निभाने के मायने
उनके आगे पीछे छिपी, अहसांसो कि गर्माहट।
उनकी रूहानियत की खुशबू।

ईश्वर उदघोषणा करता सा लगता है.
"मनुष्य मर रहा हैं."

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