"

Save Humanity to Save Earth" - Read More Here

Sunday, February 12, 2017

Tuesday, December 20, 2016

अनुपम मिश्र: साफ़ माथे वाले समाज की आवाज़।



एक हीरो वो होता हैं, जिसे दुनिया जानती हैं। एक वो, जो इस दुनिया को जानता हैं। आदमी को आदमी बनाने की एक पाठशाला, चली गई। अनुपम मिश्र चले गए। बहुत सोचता हूँ। ये भी की क्या, हमारी परेशानिया , हमारे चिंतन का दायर , हमारे व्यक्तित्व जैसा बोना हो गया हैं. हमारे चिंतन के दायरे घर और ऑफिस के बीच के सुविधा से परे नहीं जाते। सोचता हु, कब और कभी? क्या हम अपने नल और नालियो से उठकर , नदियों और तालाबो के बारे में सोच सकते हैं.  अनुपम मिश्र को जब भी पढ़ता था, एक दिलासा वापस आता था। वो भरोसे की आवाज़ थे। ऐसी आवाज़ जो परेशान, उत्तेजित, आक्रोशित नहीं करती थी, छलावा नहीं करती थी. वरन शांत करती थी, दिलासा देती थी। वो हमारे अपने इतिहास की गूंज थे। वो इतिहास जो कभी पढ़ाया नहीं गया. वो इतिहास जिसे हासिये पे डाल दिया गया। पानी को जानने वाला एक समाज चला गया।

अनुपम मिश्र , जब भी पानी और तालाब को कभी कोई खोजने की , जानने की कोशिश करेगा, आप याद आएंगे। अपनी चिंताओं के दायरे जब भी अपने घर की दहलीज से पर जायगे, आप याद आएंगे।  बहुत याद आएंगे।


Monday, September 5, 2016

श्रीगुरवे नमः


अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ 

गुरु को व्यक्तित्व से जोड़ना शायद गलत हो।  गुरु नहीं होते , गुरुत्व होता हैं। आश्चर्य नहीं, गुरुत्व से ही पृथ्वी पर विकास हुआ हो। गुरुत्व से ही पृथ्वी ने सब कुछ थाम रखा हैं. 
गुरुत्व घटित होता हैं। बच्चा भी बहुत कुछ सीखा देता हैं गर आप और बच्चे के बीच मन नाम का बन्दर न हो। जहा वास्तविक प्यास होती हैं , वर्षा वही घुमड़ती हैं। 
ओशो कहते हैं: मूर्खता हैं गर आप गुरु को खोज रहे हो। कभी कोई शिष्य गुरु को नहीं खोज पाता। गुरु ही सही अवसर पर शिष्य के पास घटित होते हैं। 
सारी यात्रा होश की तरफ ले जाती हैं गर आप खोज रहे हो। नहीं तो एक गहरी आध्यात्मिक नींद में हम सब सो रहे हैं। स्वप्न देख रहे हैं , तितली के पीछे भागने का। ओशो कहते हैं: बहुत सम्भावना हो कि , तितली ही स्वप्न देख रही हो , आप के होने का।  गहरा और चौकाने वाला प्रश्न है।  चौक गए , समझाना सोये थे। यीशु से लेकर बुद्ध और ओशो इस नींद की बात कर रहे है। इसी नींद में सोये इंसान गुरुत्व की घटना से वंचित होते हैं , विरोध करते हैं, मार देते हैं और फिर तथागत को भगवान का रूप दे देते हैं। भगवान मतलब : वो इंसान जो हमें नींद से जगाता हैं , हमें अपने क्षुद्रता और काल्पनिक बेड़ियो से परिचय करवाता हैं, आजाद करवाता हैं. परंतु हम उन बेड़ियो और क्षुद्रता के इतने आदी हैं कि उस इंसान को मार के , पुनः अपने मानसिक जेल में आकर बेड़िया पहन लेते हैं। कालांतर में उसे किसी अवतार का रूप दे देते हैं। 
क्षुद्रता हमारा चुनाव हैं। भीड़ का चुनाव हैं। क्षुद्रता लोकतान्त्रिक हैं।   

पुराण कहते हैं : जगत विष्णु का स्वप्न हैं। आइस्टीन की रिलेटिविटी और पुराण के कथन , क्षितिज पर कही एक महीन धुंधलके में मिलते प्रतीत होते हैं। जागरण की यात्रा और विज्ञानं के तर्क सामानांतर चलते हैं और कही मिलते प्रतीत होते हैं। 
गुरुत्व सम्बन्ध हैं निराकार और निरूप से। जब उससे सम्बन्ध होता हैं , गुरुत्व घटित होता हैं। एक डाकू एक महान ग्रन्थ लिख डालता हैं।
गुरुत्व पॉजिटिव और नेगेटिव कणो के बीच सदा मौजूद न्यूट्रॉन हैं। वही योगी स्वरुप हैं। 
कृष्ण जिसे सत चित आनंद कहते है. 
सुख और दुःख के दो क्षोर के बीच, स्थितिप्रज्ञ।
उसे जानने की यात्रा जीवन हैं। 
बाकि सब माया !

आज इतना ही। 
राहुल 

Tuesday, May 10, 2016

महाभारत


कोई बच्चा भिखारी पैदा नहीं होता, वरन बादशाह ! एक निज वैभव।
सांसारिकता उसके क्षरण का कारक हैं
और सच्ची आध्यात्मिकता उस बच्चे को जिन्दा रखने का तप।
क्या हम खुद को ही खोते हैं, और सारी उम्र खुद को ढूंढते हैं?
शायद जहां दूसरे की आँखों का बोध होता हैं,
वही से दूसरा बनने की प्रक्रिया शुरू होती हैं।
और एक सिफर की तरफ सफर शुरू होता हैं।
खुद से बिछडने का।
तलाश शून्य से शुरू होकर शून्यता के बोध से महा -शून्य में मिल जाने की ही हैं।
जन्मों ये यात्रा जारी रहती हैं।
राजकुमार और बुद्ध।
दो क्षोरो के प्रतिक हैं।
जन्म लेना पृकृति का तुम्हारा चुनाव हैं।
बुद्ध होना तुम्हारा।
इन दो चुनावो के बीच,
किसी अर्जुन को , कृष्ण मिल जाते हैं।
और कुछ कर्ण और अभिमन्यु की तरह अभिशप्त हो जाते हैं।
ये सारे पात्र , अलग अलग नहीं हैं।
हम ही जीते हैं, एक ही जिंदगी में।
रोज।
हर रोज महाभारत होती हैं।
और गीता भी।
संसार से सम्बन्ध महाभारत हैं।
गीता खुद से संवाद।

यदा यदा ही धर्मस्य।
-राहुल

Sunday, April 24, 2016

ये कैसा वक्त हैं।

ख़ामोशी में ये कैसा शोर हैं।
शोर में ये कैसी ख़ामोशी हैं।
आँखों में ये कैसा, पानी हैं।
होंठो पर ये कैसी हंसी हैं।

अमृत भी पीना हैं,
मर मर कर जीना हैं।
जहर भी पीना हैं।
जी जी कर मरना हैं।

होश में ये कैसी बेहोशी हैं।
बेहोशी में एक अजीब सा होश हैं।
कोई कहता, सदा तुम हो।
कोई कहता खानाबदोश हैं.

ख्वाइशों में ये कैसी नफरत हैं।
नफ़रतो मे ये कैसी ख्वाइश हैं।
जमीर का पर्दा नंगा करके।
जख्मो की कैसी नुमाइश हैं।

ये कैसा वक्त हैं।
कमबख्त हैं।

अरमानो को ज़हर देकर।
नोच लो  वजूद को।
टुकड़ो में बाट दो, हाड मांस को।
न्योता दे दो, गिद्धों को।

तेरे जीने का कोई मतलब नहीं।
तेरे इंसा होने का, कोई मतलब नहीं।

Tuesday, April 12, 2016

श श..भारत गहरी नींद में सो रहा हैं।

श श श श श श श..... भारत गहरी नींद में सो रहा हैं। या यूँ कहा जाये, सोने का नाटक कर रहा हैं। और सब शामिल हैं। ज्ञानी, अज्ञानी , मुर्ख, राजा , प्रजा , शिक्षक, रक्षक , न्यायविद। कृपया आप भी सो जाये.

Tuesday, February 23, 2016

राजनीती देश और अवाम

प्रिय राहुल, नेतागण और सभी पहले , दूसरे तीसरे , चौथे स्तम्भ।

हर मुद्दे पर विरोध नहीं होता, मेरे दोस्त। हर मुद्दे के दो पक्ष नहीं होते। कुछ मुद्दो पर एक ही पक्ष होता है , देश का पक्ष। देश के लिए शहीद, का पक्ष। देश की अवाम का पक्ष।
कुछ मुद्दो पर राजनीती की नहीं जाती , बल्कि उसे , सरकार और देश को मजबूत बनाया जाता हैं।
अफ़सोस , तुम्हे किसी ने ये बताया ही नहीं। राजनीती देश और अवाम को सशक्त बनाने का साधन हैं , स्वयंम कोई साध्य नहीं।
समय चूनौती देता है और अवसर भी। कोई भी मुद्दा हो, एक अवसर होता हैं , देश और समाज की दशा और दिशा देने और बदलने का। राजनीती सिर्फ विरोध नहीं हैं। राजनीती लीड करने और लीडर देने का नाम हैं।
हर गंभीर मुद्दा एक लक्षण हैं , कही कुछ बीमारी हैं। लेकिन , राजनीतिज्ञ उसे सिर्फ और सड़ाते हैं और सप्रेस करते हैं। और हमारा सस्ता , दो टके का मीडिया ? छोड़ो यार।
विदा करो और मुक्त करो इस देश को महापुरुषों के नामो से। जो चूनौतिया उन्हें दिखी , उन्होंने निर्णय लिए। समय की सापेक्षता के हिसाब से।
किन्तु समय परिवर्तित हैं। हम क्या कर रहे हैं ? हम ने कौन से निर्णय लिए ? हमने निर्णय के अवसरों को सिर्फ गवाया हैं। कभी किसी महापुरुष , कभी जाती , कभी धर्म , कभी गरीब के नाम पर। हर बीमारी के नए टिके ईजाद होते हैं , हम ये नहीं कहते उसी कंपनी का टिका जो ५० साल पहले बना , उपयोग करेंगे क्योकि वह कंपनी पूजनीय हैं। वह कंपनी भगवान बन मंदिर में बैठी हैं। फिर किसी व्यक्ति के लिए क्यों ?
पुराने टिके से नयी बीमारी ठीक नहीं होगी।
नए सवाल चाहिए और नए हल।
देश निर्णय से बनता हैं।
राजनीती करने से नहीं।
ये निर्णय के क्षण हैं।
समय साक्षी हैं।
अवाम अभी भी कल्कि की प्रतीक्षा में आँखे धुंधली कर नपुंसक खड़ी हैं।

Wednesday, January 6, 2016

" मैं हूँ क्योंकि, हम हैं! "

कुछ आफ्रिकन आदीवासी बच्चों को एक मानवविज्ञानी ने एक खेल खेलने को कहा।

उसने एक टोकनी में मिठाइयाँ और कैंडीज एक वृक्ष के पास रख दिए।

बच्चों को वृक्ष से 100 मीटर दूर खड़े कर दिया।

फिर उसने कहा कि, जो बच्चा सबसे पहले पहुँचेगा उसे टोकनी के सारे स्वीट्स मिलेंगे।

जैसे ही उसने, रेड़ी स्टेडी गो कहा.....

तो जानते हैं उन छोटे बच्चों ने क्या किया ?

सभी ने एक दुसरे का हाँथ पकड़ा और एक साथ वृक्ष की ओर दौड़ गए, पास जाकर उन्होंने सारी मिठाइयाँ और कैंडीज आपस में बराबर बाँट लिए और मजे ले लेकर खाने लगे।

जब मानवविज्ञानी ने पूछा कि, उन लोगों ने ऐंसा क्यों किया ?
 
तो उन्होंने कहा---" उबुन्टु ( Ubuntu ) "

जिसका मतलब है,

" कोई एक व्यक्ति कैसे खुश रह सकता है जब, बाकी दूसरे सभी दुखी हों ? "

उबुन्टु ( Ubuntu ) का उनकी भाषा में मतलब है,

" मैं हूँ क्योंकि, हम हैं! "

Tuesday, June 2, 2015

जन्मदिन मुबारक : कुछ जीवन अनुभव .


छोटे भाई का जन्मदिन हैं , कुछ लिख कर भेजा हैं। 
  1. कभी झूठ नहीं बोलना , जब तक वो किसी बड़े भले की लिए न हो। 
  2. ना कहना सीखना उन कामो के लिए, जो करना नहीं चाहते या कर नहीं सकते। 
  3. साल में कम से कम ,१० अच्छी किताबे पढूंगा। अंग्रेजी की भी, नहीं आती तो अंग्रेजी सीखूंगा। 
  4. साल में २१ दिन ध्यान को दूंगा , हो सके तो आश्रम जाकर। 
  5. साल में एक बार दूरस्थ यात्रा। 
  6. चर्बी / वजन कम करूँगा और हर दूसरे -तीसरे दिन , योग , तेज चलना और मसल का व्यवयाम। 
  7. नया काम शुरू करने से बेहतर हैं , किसी रुके काम को पहले ख़त्म करना। 
  8. अपने दोस्त और मासूम आत्माए जिन्हे मदद की जरुरत हैं, उनकी मदद करना और बदले में कोई भी अपेक्षा नहीं रखना। 
  9. जिन्होंने मदद की, उनका धन्यवाद करना। 
  10. महीने में किसी एक रिश्तेदार / दोस्त को अचानक फ़ोन करना। 
  11. परिवर्तन अच्छा हैं। खुद करे तो सबसे अच्छा। 
  12. जीवन हर रोज नया शुरू होता हैं।  याददाश्त उसे पुराना बताती हैं। भूल जाओ कचरे को या कैथार्सिस से फेक दो बाहर।
  13. जितना हो सके डेटा और तथ्यों से मूल्यांकन करना। 
  14. कौन कह रहा हैं नहीं, बल्कि क्या कह रहा हैं। क्या कह रहा हैं नहीं, बल्कि क्या कर रहा हैं , क्या कर रहा हैं नहीं , बल्कि क्या हो रहा हैं। कान से बहुत ज्यादा , आँखे बताती हैं। 
  15. स्नेह , मोह से बहुत ज्यादा मूल्यवान हैं। 
  16. कोई एक आर्ट सीखना, कुछ भी।  तबला , वायलिन, सैक्सोफोन , बांसुरी या कुछ भी। आंकड़े/व्यवसाय/विज्ञानं  जीवन का निर्वाह करते हैं, उसे सरल बनाते हैं।  कला जीवन से प्रेम हैं, लग्जरी हैं। ओवरफ्लो हैं। अज्ञात के प्रति प्रेम और समर्पण हैं। 
आज इतना ही। 
राहुल 

                              Sunday, May 24, 2015

                              जीवन


                              कब कोई कोरे पन्नो को पढ़ पाता हैं।
                              कब कोई ख़ामोशी को सुन पाता हैं।

                              शोरगुल , भीड़ और आपाधापी के बीच।
                              भीतर एक सन्नाटा हैं।

                              लिखते लिखते यु ही।
                              अश्क अक्सर ढल जाते हैं।

                              जीवन भागता रहता हैं।
                              क्या हम समझ पाते हैं.

                              -राहुल

                              Saturday, May 23, 2015

                              इन्तजार


                              फिर से कलम उठा।
                              थोड़ी सी स्याही भरता हूँ।
                              बहुत दिनों से सोचता हूँ।
                              कोई खत लिखता हूँ।

                              लिखूंगा , आप कैसे हैं।
                              याद करता हूँ।
                              अब, आप जवाब नहीं देते।
                              न ही मिलने आते हैं।
                              बहुत याद करता हूँ।
                              आपको और उन दिनों को.

                              खत सिर्फ शब्द नहीं।
                              नमी भी साथ ले जाते हैं.
                              लिखते लिखते यु ही ।
                              अश्क अक्सर ढल जाते हैं।
                              और जो समझता हैं.
                              वो उसे भी महसूस कर लेता हैं।
                              शायद, कई खत आज तक।
                              पुरे पढ़े ही नहीं गए।
                              वो आज भी इन्तजार करते हैं।
                              कमरे के किसी कोने में।
                              कोई आएगा और।
                              समझेगा , उसमे बसी ऊष्मा और नमी को।
                              खतो को ठिकाने ही नही.
                              अक्सर, पूरा पढ़ने वाले भी नसीब नहीं होते।

                              फिर भी, बहुत दिनों से सोचता हूँ।
                              कोई खत लिखता हूँ।

                              लिख देता हूँ।
                              सब कुछ।
                              जो महसूस करता हुँ.
                              जजबातों से भर देता हूँ।
                              यह भी लिख देता हूँ ,
                              की, आप के जवाब का इन्तजार करूँगा।

                              फिर आता हूँ, खत के सबसे मुश्किल हिस्से में।
                              वहा पता लिखना होता हैं.
                              वो तो मुझे नहीं पता।
                              किसे लिखू , जो समझ लेगा।
                              देर तक सोचता हूँ, रोता हूँ।
                              फिर इस खत को भी।
                              सरका देता हूँ।
                              अलमारी के किसी कोने में रखे।
                              ख़तो के ढेर की और।
                              जो आज भी अपने पते के।
                              इन्तजार में हैं।
                              पढ़ने वाले का रास्ता देखते हैं।

                              कुछ ख़त जो समझे ही नहीं गए।
                              कुछ इंसा जो पढ़े ही नहीं गए।
                              कुछ इंसा और कुछ खतो का।
                              शायद यही नसीब हैं।
                              इन्तजार।
                              एक अंतहीन इन्तजार।
                              -राहुल

                              Thursday, March 12, 2015

                              बेटियाँ

                              बेटियाँ जिद्दी होती ही हैं। 
                              हर पिता के लिए। 
                              क्योकि वही तो वे कर सकती हैं जिद। 
                              और उसे पूरी भी। 
                              और जब तुतला के वो गर माँगती भी है सितारे। 
                              कोई पिता असमर्थ नहीं होता। 
                              फड़फड़ाने देता हैं बेटी को अपने पंख। 
                              ताकि ऊची उड़ान भर सके। 
                              खुद जाके अपना आसमान ले आये। 
                              फिर एक दिन, चिड़िया उड जाये। 
                              किसी नए आसमान की तलाश में। 

                              पिता जानता हैं। 
                              बेटी की जिद। 
                              जिद नहीं होती। 
                              हौसलों की उड़ान होती हैं। 

                              और बेटी जानती हैं। 
                              उसकी जिद पूरी करना। 
                              पापा का तरीका हैं। 
                              प्यार जताने का। 

                              कुछ रिश्ते ऐसे होते ही हैं। 
                              जिन्हे शब्दों में पिरोया नहीं जाता। 
                              बस, गले लगाया जाता हैं। 

                              बेटियाँ जिद्दी होती ही हैं। 
                              हर पिता के लिए। 

                              Saturday, March 7, 2015

                              ऐ जिन्दंगी !

                              कहा चली गई तुम।
                              बड़ी शिद्दत से ढूंढता हूँ तुम्हे।
                              हर पल याद करता हूँ।
                              रोता हूँ।

                              जब साथ थी तुम।
                              आँखों में तारे।
                              होंठो पे मुस्कान।
                              दिल में अरमान थे।
                              कस के पकड़े था, में तुम्हे।
                              हर दुःख सह लेता था।

                              ऐ जिंदगी।
                              फिर लौट आओ।
                              फिर जिएंगे तुम्हे।
                              जो जीने लायक हैं।
                              चलेंगे साथ साथ।
                              बैंठेंगे फिर किसी आम के निचे।
                              कच्चा खट्टी कैरी , नमक लगाके फिर खाएंगे।
                              नहायेंगे फिर से उसी नदी में।
                              चलेंगे फिर शाम को किसी मंदिर।
                              बजायेंगे घंटिया, प्रसाद खाने के लिए।
                              खेतो में दौड़ेंगे।
                              भागेंगे तितलियों के पीछे।
                              एक तेरी वाली , एक वो पिली सी , मेरी वाली।
                              सोयेंगे खुली छत पर।
                              गर्मियों में उन , ठंडे से बिस्तरों पर।
                              लौट मारते हुए।
                              और हर रात , हर बच्चे को शंहंशाह बना देती हैं।
                              अपने सारे तारे मोती लुटा के।
                              करेंगे अपने सितारे से बात।
                              बिन शब्दों के।
                              और डूब जायेंगे उन्ही के सपनो में।

                              तुम सुन रही हो न !
                              आ जाओ न फिर से।
                              वादा करता हूँ।
                              नहीं जाऊंगा शहर, तुझे छोड़ के।
                              नहीं बनूँगा "सभ्य" फिर से।
                              नहीं देखूंगा किसी और की नजर से खुद को।
                              नहीं भागूँगा किसी मरीचिका के पीछे।
                              नहीं बनुगा चतुर।
                              मैं बुद्दू ही ठीक हूँ।
                              देखो न।
                              मैं पहले जैसा ही हो गया हूँ।
                              दुनिया फिर से पागल समझती हैं।
                              बाट देता हूँ फिर से, सारी खुशिया।
                              नहीं रखता तिजोरी में संभालकर।
                              फिर से समंदर किनारे रंग बिरंगे कंकड़ ढूंढता हूँ।
                              देखता हूँ लहरो को बनते , फिर बिखरते।
                              सुनता हूँ उनका कृन्दन।
                              मैं फिर से तुम सा हो गया हूँ।


                              अब तो आ जाओ न।
                              तुम्हे जोर से गले लगाना चाहता हूँ।
                              मोती जो संभाले।
                              तेरे काँधे के लिए।
                              देना चाहता हूँ

                              कहा चली गई हो तुम।
                              आती क्यों नहीं।
                              बड़ी शिद्दत से ढूंढता हूँ तुम्हे।
                              हर पल याद करता हूँ।
                              रोता हूँ।
                              मैं बहुत रोता हूँ।
                              ऐ जिन्दंगी !

                              Monday, March 2, 2015

                              शून्यता


                              शून्य का अपना कोई मतलब नहीं होता। 
                              यही उसकी बैचैनी भी हैं। 
                              खोजता हैं आदमी इसीलिए।
                              अपने होने का अर्थ। 

                              कभी प्रकति, कभी लोगो से। 
                              बनाता हैं रिश्ते, करता हैं प्रेम।  
                              खुद को लुटाता हैं। 
                              शायद दो शून्य मिलकर। 
                              शून्य से कुछ ज्यादा हो जाये। 

                              जैसे कृष्ण - राधा। 
                              जैसे शिव - सती। 
                              एक दूसरे के बिना। 
                              अधूरे से। 

                              तुम गणित में मत उलझना। 
                              शून्य और शून्य मिलकर। 
                              शून्य नहीं होता,
                              जिंदगी में। 

                              उसे पूर्ण कहते हैं। 

                              एक शून्य तलाश करता हैं। 
                              अपने माने, पाने की। 
                              पूर्ण होने की। 
                              फिर, बुद्ध हो जाता हैं।  
                              यही जीवन यात्रा हैं। 

                              Wednesday, February 11, 2015

                              Sunday, January 18, 2015

                              जड़ो से जुड़े रहने के मायने।


                              तुम मिया, गलत करते हो। 
                              सही सवाल पूछते हो। 
                              पर गफलत करते हो। 

                              जड़ो से जुड़े रहने के मायने। 
                              मौसमो से नहीं पूछे जाते। 
                              इस रंग बदलती दुनिया में। 
                              आज, गिरगिट भी शर्मशार हो जाते। 

                              ये प्रश्न उनसे पूछो। 
                              जो चिडिओ को दानापानी रखते हैं। 
                              बुजर्गो की निशानियाँ संभालते हैं। 
                              तिजोरिओ में मोती न हो मगर। 
                              आँखों में दूसरे के दर्द के अश्क रखते हैं। 

                              तुम मिया, गलत करते हो। 
                              सही सवाल पूछते हो। 
                              पर गफलत करते हो। 

                              जड़ो से जुड़े रहने के मायने। 
                              गर पूछना ही हैं। 
                              तो जाकर किसी बरगद के पेड़ से पूछो। 
                              वो भी चलता हैं, मियां, "आगे बड़ विकास" भी करता हैं। 
                              पर जड़े जमा कर चलता हैं। 
                              बना के रखता हैं, अस्तित्व से संपर्क।

                              तुम मिया, अक्सर गलत करते हो। 
                              सही सवाल पूछते हो। 
                              पर गफलत करते हो। 

                              -राहुल 

                              कितनी निर्दयी हो तुम.
















                              कभी रेत के मानिंद, मुट्ठी से फिसलती हो।
                              कभी गले लगाती हो।
                              कितनी निर्दयी हो तुम.
                              ऐ जिंदगी, क्यों सताती हो.

                              तुम माशूक की तरह हो।
                              सामने होती हो, वक्त को अक्सर रोक देती हो।
                              कोई गम नहीं, जब साथ नहीं।
                              टीस तब उठती हैं, जब तुम याद आती हो.

                              कितनी निर्दयी हो तुम.
                              ऐ जिंदगी, क्यों सताती हो.

                              बसंत की अंगड़ाई लेती दोपहर।
                              दूर कही, रेडियो पर, कोई गजल।
                              हवा का छु कर गुजरना।
                              और पत्तियों की सरसराहट।
                              दिल बैठ सा जाता हैं।
                              वक्त को थाम लेने का मन करता हैं।
                              पर रूकती कहा हो तुम।
                              बीतती जाती हो।

                              कितनी निर्दयी हो तुम.
                              ऐ जिंदगी, क्यों सताती हो.

                              -राहुल

                              Saturday, July 12, 2014

                              सिकंदर चला गया.

                              जबसे लोगो की आँखों से, पानी चला गया.
                              बरसा नहीं बादल, खाली चला गया.

                              रहनुमा की उम्मीद में बैठे हैं सभी.
                              आया नही अभी तक, कहा चला गया?

                              वो बेफिक्री, वो आशिकी, वो पागलपन।
                              हर साँस थामा मगर,वो वक्त चला गया.

                              ये दौड़ हैं अंधी, एक खेल के मानिंद।
                              मजा क्या अब इसका, वो बच्चा चला गया.

                              तुझे नाज है, दौलत का, ठीक हैं नदीम।
                              देख, अभी-अभी, खाली हाथ, सिकंदर चला गया.

                              जबसे लोगो की आँखों से, पानी चला गया.
                              बरसा नहीं बादल, खाली चला गया.

                              आज इतना ही.
                              राहुल