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Save Humanity to Save Earth" - Read More Here

Friday, March 1, 2019

मेरा भारत फिर भी महान

नंगा राजा
तमाशाबीन
ताली ठोकती जनता
भूख भगवान है
तन मन बाजार
बास मारते आदर्श
क्रिकेट धर्म
क्रिकेटर हीरो

जब तक गोलिया सरहद
तक है
जब तक उन्हें झेलते सीने पडोसी के है
हमें क्या
NCC नहीं बेटा
वहा टाइम वेस्ट नहीं करो
क्योकि वहा तो डिसिप्लिन सिखाते है
वो क्यों चाहिए
क्रिकेट खेलो
टीवी पे आ जाओ किसी तरह
बड़ा दो माँ बाप का गौरव इस तरह।

ये टुच्चापन
हमारी आत्मा से आती बदबू है
घिन आती है

शांति पसंद राष्ट्र मेरा
गुलाम की करेंसी से ही सही
शांति ख़रीदेंगे
गुलाम होना
सब सहन कर लेना
पेट भरने के लिए
आत्मा बेचना
हमारा परिचय

इन्द्रिय जनित सुख, क्रिकेट धर्म
विकसित देश का वीसा
वास्तविक इन्फ्लेशन को अगूंठा दिखती
काले पैसे की पोषक
कुछ रियल एस्टेट

देश की पूंजी को
चाटते, बाटते, अपराधियों को पालते
और जमीं को आसमान तक महंगा करने वालो को पोषते
और NPA बनाते बैंक मैनेजर और उनके आका
ऐश करते है
फिर भी उन्ही बैंको मे
८% FD कराते समाजवादी मुर्ख
फिर अपने और बच्चो के लिए
एक बेहतर समाज और नौकरियों
की उम्मीद रखते है।

और हा
इन सब के बीच
अगर २६ जनुअरी
और १५ अगस्त
और उरी ,
और पुलवामा,
और कारगिल
और संसद हमला ,
और सम्झौता एक्सप्रेस हमला
और काबुल भारतीय दूतावास हमला
और २६/११ मुंबई
और १९६५ , १९७१ युद्ध
और सरहद
और सिज़ फायर में रोज मरते सैनिक
और अंत मे
फिर भी
आपको झेलता,
टूटता,
लड़खिड़ाता
जयचंदो से घाव खाता
फिर भी आपको सहजता
देश और सैनिक याद आ जाये
तो

भारत माता की जय
जय हिन्द।
मेरा भारत महान।

मत बोलना।
अच्छा नहीं लगता।
आईने देख कर
भीतर की सड़ांध देख लेना
और अपनी काहलियत
और बेबसी पर
फुट फुट कर रो लेना।
बस.

सुना है इस युग में
आंसू
गंगा की तरह पाप धोते है.

Friday, December 14, 2018

शहरी - गँवार

बीड़ी फूकते हुए
कम्बल ओढे हुए

टेलीविज़न वा देखते हुए
जितवा बड़बड़ाया

ई शहर का लोग
स्टूडियो में टाई कोट पहेन के

गांव की समस्या की बात करते हुए
कितना गँवार (देहाती) लगता है बे।

Sunday, May 20, 2018

मिजाज

ये अजीब सा मिजाज
मेरे गॉव से मिला मुझे
शहर में अकेला हूँ
चाय फिर भी २ कप बन जाती है।

Friday, March 16, 2018

मेरे गॉव

अक्सर गॉव जाते है शहर
तलाशते है मकसद
भिड़ते लड़ते पीटते
खोते है खुद को
आहिस्ता आहिस्ता

मगर जब भी बारिशे
भिगोती है माटी को।
नम आँखों की बरसातों से
भीतर सौंधी खुशबु फिर महकती है।
गॉव फिर जिन्दा हो उठते है।
मेरे गॉव फिर जिन्दा हो उठते है।

Thursday, November 16, 2017

अलविदा : कुंवर नारायण

आज बहुत अच्छा पढ़ा,जिसे साहित्य कहते है, पढ़ा।  कुंवर नारायण को पढ़ा।
अभिजात्यपन से फिर आंखे चार हुई। कुहासे के पीछे छुपा, वैभव फिर याद आया। नेत्र नम है।

अपने से परिचय एक गहरा संतृप्त अनुभव देता है। अभिजात्य साहित्य आपकी अंगुली पकड़ कर, बड़े मनुहाल से ले चलता है उस पार। जीवन के आपाधापी के टुच्चे पन को कही दूर फेककर , आत्मा उजास से भरती है।

अच्छा साहित्य एक उजास भरता है। कलंकित नहीं करता। जीवन ऊर्जा को उर्ध्व गति देता है.

ध्यान का गहरा अनुभव खुद की अनुपस्थिति से पैदा होता है।

आज इतना ही।
ओके मनीषा?