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Save Humanity to Save Earth" - Read More Here


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Thursday, March 12, 2015

बेटियाँ

बेटियाँ जिद्दी होती ही हैं। 
हर पिता के लिए। 
क्योकि वही तो वे कर सकती हैं जिद। 
और उसे पूरी भी। 
और जब तुतला के वो गर माँगती भी है सितारे। 
कोई पिता असमर्थ नहीं होता। 
फड़फड़ाने देता हैं बेटी को अपने पंख। 
ताकि ऊची उड़ान भर सके। 
खुद जाके अपना आसमान ले आये। 
फिर एक दिन, चिड़िया उड जाये। 
किसी नए आसमान की तलाश में। 

पिता जानता हैं। 
बेटी की जिद। 
जिद नहीं होती। 
हौसलों की उड़ान होती हैं। 

और बेटी जानती हैं। 
उसकी जिद पूरी करना। 
पापा का तरीका हैं। 
प्यार जताने का। 

कुछ रिश्ते ऐसे होते ही हैं। 
जिन्हे शब्दों में पिरोया नहीं जाता। 
बस, गले लगाया जाता हैं। 

बेटियाँ जिद्दी होती ही हैं। 
हर पिता के लिए। 

Saturday, July 12, 2014

सिकंदर चला गया.

जबसे लोगो की आँखों से, पानी चला गया.
बरसा नहीं बादल, खाली चला गया.

रहनुमा की उम्मीद में बैठे हैं सभी.
आया नही अभी तक, कहा चला गया?

वो बेफिक्री, वो आशिकी, वो पागलपन।
हर साँस थामा मगर,वो वक्त चला गया.

ये दौड़ हैं अंधी, एक खेल के मानिंद।
मजा क्या अब इसका, वो बच्चा चला गया.

तुझे नाज है, दौलत का, ठीक हैं नदीम।
देख, अभी-अभी, खाली हाथ, सिकंदर चला गया.

जबसे लोगो की आँखों से, पानी चला गया.
बरसा नहीं बादल, खाली चला गया.

आज इतना ही.
राहुल

Saturday, May 24, 2014

सब बच्चे लगे!

मुनव्वर जैसे बड़े शायरों को जब भी सुना, लिखे बिन रहा नहीं गया. ये वो पीर हैं जो सीधा उससे जोड़ते हैं. और जब आप उससे जुड़ते हैं तो, फिर आप, आप नहीं होते. वो ही होता हैं. समंदर से मिल कर बूँद की फिर क्या औकात।

उन्हों पलो वो होता हैं, जो एक हाड़ मांस का पुतला नहीं कर सकता। कुछ अनोखा, कुछ बिलकुल अनदेखा-अनसुना। बाकि सब नक़ल हैं, कूड़ा हैं.

कुछ नई पंक्तिया प्रस्तुत हैं.

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मुझ माझी को कब किनारे मिले
तुझ को भी क्या, मुझसे बेचारे मिले?
जिन आँखों से थी, मुझे मय दरकार,
रेगिस्ता वहा हज़ारो मिले।

मुझ माझी को कब किनारे मिले!
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मैं प्यासा ही रहा, मुझे समन्दर नसीब हुए.
वो पास रह कर भी, कब करीब हुए.
सब कहते हैं, उन्हें उनका प्यार मिला।
मेरे साथ ही क्या, ये किस्से अजीब हुए?
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उसके प्यार से खिलाये अधपके रोट, अच्छे लगे.
मेरा क़ातिल मुझ से बिछुड़ के रोया जो आज, आंसू उसके, सच्चे लगे.
दामन फैला के मैंने अपना, आसमां से जो देखा आज.
भीड़ में लड़ते-भागते , बड़े बड़े, सब बच्चे लगे.

बड़े बड़े, सब बच्चे लगे.

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आज इतना ही.

Tuesday, December 31, 2013

फ़ारूक शेख: ठहराव और संजीदगी.

"फिर छिड़ी रात बात फूलों की" । रेडियो पर सायमा RJ Sayema ने जब ये गाना बजाया, मेरे तो सारे तार बज से गए.।
फारूक साहब चले गए. उनकी अदायगी एक ठहराव देती थी. मानो समय इसी पल में जम गया हो. आज तकनीक तो बहुत उन्नत हैं, लेकिन अदाकारों में एक जल्दीबाजी सी लगती हैं. एक दौड़ जो पहुचाती कही नहीं। सोने पे सुहागा मुहावरा अपना अर्थ पाता हैं, जब जगजीत & तलत अज़ीज़, फारूक के लिए गाते हैं। मानो एक ठहराव दूसरे कि तलाश में निकला था और वो पूरी हुई.

सायमा ने दीप्ती जी बात की. बहुत बहुत गहरी उदासी थी. जिंदगी का आधा हिस्सा अचानक अलग हो जाये, तो फिर आधे बचे का क्या वजूद। बातो के दौरान ही यह बात निकल कर आई कि, फारूक साहब को पोएट्री , उर्दू शायरी का काफी शौक था. और इसे मै साहित्य & समाज की बहुत बड़ी  क्षति कहूंगा कि, फारूक साहब शायरी पर ही एक बहुत खूबसूरत प्रोग्राम लेकर आने वाले थे. और ख़ुदा से ये गुनाह हो गया.

वो संजीदगी, ठहराव, एक तीव्र गहरापन। जिंदगी अपने मायने पाती थी और इसीलिए मासूमियत, भोलापन, सहजता & स्नेह के दैवीय गुण तब के इंसानो में होते थे. अब? बोन्साई, उथलापन, भीड़ & एक अंधी दौड़. सब दौड़ रहे, पहुच कोई नहीं रहा.

ख़ुदा उन्हें जन्नत नसीब करे.उस "ठहराव" को सुनते हैं.

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फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात हैं या बरात फूलों की

फुल के हार, फुल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की

आप का साथ, साथ फूलों का
आप की बात, बात फूलों की

फुल खिलते रहेंगे दुनियाँ में
रोज निकलेगी, बात फूलों की

नज़ारे मिलती है, जाम मिलते है
मिल रही है, हयात फूलों की

ये महकती हुयी गज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में, रात फूलों की


Saturday, August 10, 2013

मेरी कविता, मेरा परिचय.

कुछ आस, कुछ निरास,
कुछ बुझी, बुझी सी प्यास,
कुछ विश्वासों के ढहने की टीस,
कुछ, न मिल पाने की खीज।
कुछ खुशबू, कुछ काटे
कुछ दूसरो से मिले, कुछ अपनों ने भी बांटे।
कुछ मेरी, कुछ तेरी कहानी
कुछ खरा - खारा सा पानी।
एक अनमने, मासूम बच्चे से दिल की
जीवन से आपाधापी।
मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।

मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।

Monday, June 24, 2013

मेरे ख्वाब.

तुझे देखता रहू , 
या सांसो की डोर थामे रहु. 
न देखा, तो क्या जी पाउँगा।
देखता रहा, सांसे न ले पाउँगा।
कौन है तु.

तू  शायद, अलसुबह देखा ख्वाब हैं,
जो इतना सच्चा लगता हैं 
कि साँसे रोक देता हैं।
लगता है वही जीना, जीने लायक हैं।
लेकिन जब टूटता है,
तो फिर साँसे रोक देता हैं।

फिर भी मैं, अपने अन्दर के बच्चे को समझाता हूँ.
ख्वाब एक ख्वाब ही तो है. 
ख्वाब ही रहा होगा। 
और जीते चला जाता हूँ।
बहता और बीतता रहता हूँ।
लेकिन जब कभी थोड़ी सी भी फुर्सत मिलती हैं 
मेरे ख्वाब तुम बहुत याद आते हो. 
तुम मुझे  बहुत याद आते हो...  

Friday, March 29, 2013

मेरे आंसू - तेरे दोहे.


शुक्रगुजार हूँ, निदा साहब का। अलसुबह देखे एक ख्वाब का, सुबह पानी पिने आई गौरेया का। सुबह से ही सावन बरस रहा हैं। और रिमझिम नहीं, धुआधार बरस रहा हैं। बाबा कबीर कह ही गए हैं, "कबहि कहु जो मैं किया, तू ही था मुझ माहि।" तो कुछ दोहे भी कागज पर स्याह बन उतर आये।
दर्द और आंसुओ का अस्तित्व से सीधा संवाद होता हैं। कोई मीडिएटर नहीं चाहिए। लेकिन उसके लिए एक गहरी सवेंदंशिलता चाहिए। आज सवेंदना सरस्वती के सामान सुख गई हैं, और इश्वर मर चूका हैं, का उदघोष-सन्देश समाज साफ साफ़ दे रहा हैं। तो बात सीधी हैं, अब उसे किसी बोद्धिक सम्भोग की चाह में , जटिल किया जाये, तो परिणाम भी अनसुलझा छिन्न भिन्न समाज होगा।

खैर। फिर से शुक्रिया, उन बादलो का जो सावन लेके आये।
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थोडा नमकीन पानी और फिर बची राख।
साहूकार ने लगाया, जब आदम का हिसाब।

हिसाब किताब में कब समाया तेरे मेरा प्यार।
साहूकार चूक गया, यादे - सांसे - वक्त- गर्मी - ख्वाब।

खुदा तेरी इक दुनिया हैं, एक मेरी भी दुनिया हैं।
तेरी दुनिया भय की, मेरा, प्यार रुआब।

किसने बनाये परिंदे, ये जंगल, जानवर, पानी।
किसी किसी आदम को ही मिलता, इन्सां का ख़िताब।

पीने वाले मधुशाला जाने, पढने वाले पढ़ पाते हैं,
एक खारा - खरा -गीला पन्ना, मेरी जीवन कोरी किताब।

थोडा नमकीन पानी और फिर बची राख।
साहूकार ने लगाया, जब आदम का हिसाब।

-आज इतना ही।

Monday, March 11, 2013

पानी केरा बुलबुला


निर्गम अनजान बीहड़ में कही
एक अनघड जंगली फ़ूल
सोचता हूँ कितनी होंगी
उसकी महत्वकांछाये!

अरबो की भीड़ में
मिटटी का पुतला, अदना इन्सान
अगले पल एक मांस पेशी धडकी
साँस आई और गई, तो जिया।
फिर भी कितने सपने
कितनी आकांछाये !

दोनों दो पल के।
फिर गिर जाना हैं।
आदम क्यों नहीं समझता
उसे भी जाना हैं।

विडम्बना ये हैं
मुरझाने से पहले
वो फूल तो खिलता हैं।
महकता हैं।
सार्थक होता हैं
किन्तु जाने से पहले
आदम, इन्सान नहीं बन पाता हैं।
दुसरे की आँखों से जीता
क्यों नहीं खिल पाता हैं।

नम पलके लिए, सोचता हूँ.
आदम, क्यों नहीं खिल पाता  हैं।

Sunday, January 27, 2013

तू या मैं?


रोज सबेरे मैं ही तो आता हूँ,
तभी तो होती हैं रौशनी
तुम्हारा अँधेरा हरता हैं।

ये तो तुम्हारी ही समस्या हैं,
तुम चले जाते हो
मंदिर मस्जिद में मुझे खोजने।

और मैं आता हूँ कई भेष लिए
तुम्हारे दरवाजे पर
खटखटाता भी हूँ।
पर तुम विचरते हो
किसी और माया -संसार में।

और फिर तुम नास्तिक बन जाते हो।
कहते हो कि "मैं" मर गया।
हाँ, मैं मरता हूँ हर गुजरे पल में।
लेकिन रहता हूँ, पैदा होता हूँ, हर नए ताजे पल में, मैं ही।

भूतो न भविष्यति।
मैं वर्तमान हूँ।
कुछ भी नाम दे दो मुझे।
मैं प्रार्थना ,मैं ही अजान हूँ।
गीता और कुरान हूँ।
नाद में "हूँ" मैं।
मैं ही अनाद में।
मैं प्रेम में।
नि:छल मुस्कान में।
खोजने की वस्तु नहीं, मैं।
जीने में मिलता हूँ।
मैं वो फ़ूल हूँ,
जहा तुम्हारा, "मैं" नहीं
वही खिलता हूँ।

जहा तुम्हारा "मैं" नहीं
वही खिलता हूँ।
**********************
-आज इतना ही।

Monday, October 15, 2012

वक्त

वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं.
जो लिखे नहीं, खाली रह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं.

आंधीया तो गुजरी हैं, मेरे भी घर से.
कुछ चिराग हैं, फिर भी जले रह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

मैने तो कुछ पन्ने सिर्फ काले किये.
वो खुदा ही हैं, जो कुछ कह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

बड़ी मुद्दत के बाद ये यकीं हुआ हैं.
पराये शहर में, अपने भी मिल जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

यु ही फिर, जिन्दंगी की किताब पूरी होती जाती हैं.
कुछ पन्ने लेकिन गुलाब रख, खाली भी छोड़े जाते हैं. 
वक्त के पन्ने उड़ते........

और शब्दों  में तुम किताबो के मायने देख,  चुक न जाना.
तथागत, गंध अपनी, कोरे पन्ने पे छोड़ जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते........

तुझसे इश्क करू या रंजो गम करू ए जिन्दंगी.
कुछ रिश्ते, अजनबी बन भी निभाए जाते हैं.

वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं.
जो लिखे नहीं, खाली रह जाते हैं.
वक्त के पन्ने उड़ते जाते हैं....


आज इतना ही.
राहुल 

Sunday, June 17, 2012

पिक्चर अभी बाकि हैं मेरे दोस्त...

एक पल में जिन्दगी बदलने की ताकत होती हैं. हमारी जिन्दगी अगले पलो में कैसी होगी, चलिए देखते हैं... जिन्दगी का ड्रामा अनवरत गतिमान हैं...

कहते हैं जिन्दगी में कही कोई मंजील नहीं हैं, वरन जिन्दंगी सफ़र का नाम हैं. सुना यह भी हैं कि भगवान जिंदगी रहते, इसीलिए कभी किसी को नहीं मिलता, क्योकि मिल जाये तो फिर क्या? फिर अगले पल का क्या उपयोग? रविंद्रनाथ ने इस पर बहुत खुबसूरत लिखा हैं, बन्दे कि नेक नियत से खुश हो ईश्वर ने उसे अपने पास बुलाया. वो पहुच भी गया द्वार तक, पर दस्तक देने से पहले सिहर गया. पूरी उम्र जिसकी चाहत में गुजरी, वो मिल जाये, फिर क्या? वो लौट आया, और अवाम से वहा पहुचने का रास्ता बताने लगा. शायद बुद्ध भी इसीलिए आये. 

शायद इसीलिए कहते की समाधि और ध्यान एक शाश्वत अ-समय और अ-स्थान अनुभव हैं. उस पल आप ब्रम्हांड से एकाकार हैं. फिर कोई यात्रा नहीं. फिर कोई नया सफ़र नहीं. फिर कोई दर्द नहीं, फिर कोई शायद ख़ुशी भी नहीं.

तो अगर कोई ख्वाहिश बाकि हैं, अगर कोई आरजू दिल में धड़कती हैं, अगर कुछ और पाना हैं,  तो फिर जिन्दगी का सफ़र जारी हैं. पिक्चर अभी बाकि हैं मेरे दोस्त...:-)

Love 
Rahul

Thursday, May 10, 2012

कुछ कहना चाहता हूँ....

इससे पहले की मैं ग़ुम हो जाऊ.
दूर कही अस्मां में खो जाऊ.
खट्टी मीठी यांदे बन जाऊ.
और अकेले में रुला जाऊ.
इससे पहले कि राख हो जाऊ.
मिटटी में मिल खाक हो जाऊ.
इससे पहले कि अहसास बन जाऊ.
उन लम्हों कि साँस बन जाऊ.
इससे पहले कि कोई छीन ले.
इससे पहले कि यम मुझे भी गिन ले.
इससे पहले कि आंसू बन जाऊ.
खारा पानी बन ढल जाऊ.
इससे पहले कि कहानी बन जाऊ.
किस्सों बातो में याद आऊ..

कुछ कहना चाहता हूँ.
कह नहीं पाता हूँ.
शब्द औकात पर आ जाते हैं.
कम पड़ जाते हैं.
आंसुओ से काम चलाता हूँ.
बाहर मुस्करा के, भीतर कसक दबाता हूँ.
मेरी बेरुखी पर मत जाना, वक्त ने दी हैं.
अन्दर से वही हूँ, बस चमड़ी सख्त कर दी हैं.
और माफ़ी मांगता हूँ उन पलो कि लिए,
जीवन की आपा धापी में तुम्हे जो दे नहीं पाया.
और आज कहना चाहता हूँ, जो कह नहीं पाया.
उन सभी से जिन्होंने, दिया हैं प्यार मुझे.
अनजाने ही बिना कोई गणना किये...
कुछ बहुत दूर चले गए.
असमा मे तारे बन गए.
भीनी सी जिनकी सुगंध अभी भी आती हैं.
कुछ मेरे आस पास हैं.
जीवन का अहसास हैं.
ये कोई मोल  नहीं करते हैं.
क्या मिलेगा, तोल नहीं करते हैं.
निराश जब होता हूँ, तथाकतिथ इंसानों से जब,
खुदा से भी भरोसा उठ जाता हैं.
जीने की वजह, बेटी का चेहरा बन आता हैं.
सभी से, हा इन सभी से.
कहने दो आज मुझे.
कि मै भी उन्हें याद करता हूँ
अकेले मे अक्सर रो भी लेता हूँ.
नम आँखों से कहता हूँ,
मै भी तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ.
नम आँखों से कहता हूँ,....मै भी तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ..

Sunday, April 29, 2012

बसंत के मायने: तब और अब.

बसंत के मायने क्या वक्त और स्थान बदल देता हैं? कभी किसी मासूम  उम्र में, फूलों की सुवास प्रिय से आती लगती हैं., और अब पतझड़ की चिंता उस सुगंध  को आत्मा तक नहीं पहुचने देती, और टेसू के फूल का रंग, परिस्थितियों से संघर्ष और उससे उपजी बेबसी से बरसते खून के आंसू से सुर्ख लाल प्रतीत होता हैं..इंसानों में रीतता आँखों का पानी और गिरता जल स्तर, कही कोई सम्बन्ध हैं? पता नहीं. आज व्यवस्था बहुत बड़ी हो चुकी हैं, और इन्सान अदना. व्यवस्था भूल गयी कि उसे इस सामान्य इन्सान के लिए ही बनाया गया हैं, और नियमो के निम्नतर अर्थो  में उलझी हैं. वही अदने इन्सान ने भी वक्त के साथ अपने वजूद को बेच पेट भरने का निश्चय कर लिया हैं. दोनों अपना अर्थ खो रहे हैं, और किसी बोस, सरदार, गाँधी का इंतजार व्यर्थ हैं, क्योकि उन्हें आँखों के पानी वाले इन्सान मिले थे. निराश तो हूँ, लेकिन क्या करू, ब्लड ग्रुप बी+ मिला हैं, तो खून के साथ न्याय जरूर करूँगा. मेरी अदनी सी कोशिश और प्रयोग जारी हैं, पिछले बरस "सच बोलने का प्रण लिया था", और बहुत जूते पड़े थे. Dell कार्नेगी आज भी मौंजू हैं (तारीफ करो और काम निकालो)  और सत्य पराजित. क्योकि सत्य आज outdated हैं, ओल्ड fashioned हैं, झूठ और फरेब, आज के नए बिज़नस मंत्रा हैं. हर कोई एक दुसरे को गंजा समझ, कंघा बेचने में, अपना सब कुछ बेच चूका हैं जो अमूल्य था और सिकन्दर को भूल गया हैं, जिसने अपनी अंतिम यात्रा मैं, खाली हाथ बाहर रखवाए थे...जब सिकंदर भी खाली हाथ गया......तो ....
खैर वक्त के उस दौर कि कुछ पंक्तिया याद आ रही थी, तो सोचा इस मौन को तोडा जाये, जो मेरी इस बरस का प्रण हैं. मौन, लेकिन सार्थक मौन, ख़ामोशी नहीं जो इस देश के सरदार ने अख्तियार कर बेडागर्क  कर दिया हैं. और एक अधेड़ होता इन्सान जिसके पास  देश को परिवर्तित  का पॉवर हैं, किन्तु अपने को किसी प्रदेश  में साबित करने के अपनी जिद के पीछे , देश का इतना मूल्यवान समय जाया कर रहा हैं. 

खैर..अब उस बसंत को याद किया जाये, जब जमाना, पैरो कि ठोकर पे रहता था..और हम, हम आसमां में.:-)
_____________प्यार एक मौन.____________________________________________
हर पल तेरी यांदो का साया साथ हैं.
करू भले ही इंकार, लेकिन कुछ  बात हैं.
वरना क्यों हो जाता हूँ खामोश मैं, भरी महफ़िल में?
जब तेरा नाम किसी के लब से निकलता हैं.
वरना क्यों जब राह में, नहीं होता हैं तेरा साथ.
तो राह में पड़े पत्थरो, मैं पैरो से मारता चलता हूँ.
वरना क्यों, जब तू आती हैं सामने
तो ये दिल जोरो से धडकता हैं.
करना तो चाहता हूँ, हजारो बातें.
पर एक शब्द तक नहीं निकलता हैं.
कुछ बात हैं, हा जरूर कुछ बात हैं.
शब्द जिसे नहीं कर सकते अभिव्यक्त, वो ऐसी कुछ खास हैं.
शायद मौन ही उसकी अभिव्यक्ति का उपाय भला हैं.
जिसे हम-तुम ने प्यार नाम दिया हैं...
जिसे हम-तुम ने प्यार नाम दिया हैं............

आज इतना ही.

Saturday, June 18, 2011

मौन ही बेहतर प्यार की भाषा.

बहुत दिनों से ब्लॉग पर सुखा पड़ा था, सोचा कुछ बुँदे के साथ ही सही, मानसून का स्वागत तो किया जाये. मौन के कुछ पलों में, कुछ उतरा, उसे ही लिख देता हूँ.

---*** मौन ही बेहतर प्यार की भाषा. ***---------

भाषा - बोली यही आ सीखी.
बोला वही, जो बात तुझमे दिखी.
तुने क्या समझा, मैंने क्या कहा.
बोली का धोखा, हमेशा रहा.
दिल ही दिल की समझे परिभाषा.
मौन ही बेहतर प्यार की भाषा.

आज इतना ही.
राहुल.