"

Save Humanity to Save Earth" - Read More Here

Tuesday, December 31, 2013

फ़ारूक शेख: ठहराव और संजीदगी.

"फिर छिड़ी रात बात फूलों की" । रेडियो पर सायमा RJ Sayema ने जब ये गाना बजाया, मेरे तो सारे तार बज से गए.।
फारूक साहब चले गए. उनकी अदायगी एक ठहराव देती थी. मानो समय इसी पल में जम गया हो. आज तकनीक तो बहुत उन्नत हैं, लेकिन अदाकारों में एक जल्दीबाजी सी लगती हैं. एक दौड़ जो पहुचाती कही नहीं। सोने पे सुहागा मुहावरा अपना अर्थ पाता हैं, जब जगजीत & तलत अज़ीज़, फारूक के लिए गाते हैं। मानो एक ठहराव दूसरे कि तलाश में निकला था और वो पूरी हुई.

सायमा ने दीप्ती जी बात की. बहुत बहुत गहरी उदासी थी. जिंदगी का आधा हिस्सा अचानक अलग हो जाये, तो फिर आधे बचे का क्या वजूद। बातो के दौरान ही यह बात निकल कर आई कि, फारूक साहब को पोएट्री , उर्दू शायरी का काफी शौक था. और इसे मै साहित्य & समाज की बहुत बड़ी  क्षति कहूंगा कि, फारूक साहब शायरी पर ही एक बहुत खूबसूरत प्रोग्राम लेकर आने वाले थे. और ख़ुदा से ये गुनाह हो गया.

वो संजीदगी, ठहराव, एक तीव्र गहरापन। जिंदगी अपने मायने पाती थी और इसीलिए मासूमियत, भोलापन, सहजता & स्नेह के दैवीय गुण तब के इंसानो में होते थे. अब? बोन्साई, उथलापन, भीड़ & एक अंधी दौड़. सब दौड़ रहे, पहुच कोई नहीं रहा.

ख़ुदा उन्हें जन्नत नसीब करे.उस "ठहराव" को सुनते हैं.

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फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात हैं या बरात फूलों की

फुल के हार, फुल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की

आप का साथ, साथ फूलों का
आप की बात, बात फूलों की

फुल खिलते रहेंगे दुनियाँ में
रोज निकलेगी, बात फूलों की

नज़ारे मिलती है, जाम मिलते है
मिल रही है, हयात फूलों की

ये महकती हुयी गज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में, रात फूलों की


Saturday, August 10, 2013

मेरी कविता, मेरा परिचय.

कुछ आस, कुछ निरास,
कुछ बुझी, बुझी सी प्यास,
कुछ विश्वासों के ढहने की टीस,
कुछ, न मिल पाने की खीज।
कुछ खुशबू, कुछ काटे
कुछ दूसरो से मिले, कुछ अपनों ने भी बांटे।
कुछ मेरी, कुछ तेरी कहानी
कुछ खरा - खारा सा पानी।
एक अनमने, मासूम बच्चे से दिल की
जीवन से आपाधापी।
मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।

मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।

Monday, June 24, 2013

मेरे ख्वाब.

तुझे देखता रहू , 
या सांसो की डोर थामे रहु. 
न देखा, तो क्या जी पाउँगा।
देखता रहा, सांसे न ले पाउँगा।
कौन है तु.

तू  शायद, अलसुबह देखा ख्वाब हैं,
जो इतना सच्चा लगता हैं 
कि साँसे रोक देता हैं।
लगता है वही जीना, जीने लायक हैं।
लेकिन जब टूटता है,
तो फिर साँसे रोक देता हैं।

फिर भी मैं, अपने अन्दर के बच्चे को समझाता हूँ.
ख्वाब एक ख्वाब ही तो है. 
ख्वाब ही रहा होगा। 
और जीते चला जाता हूँ।
बहता और बीतता रहता हूँ।
लेकिन जब कभी थोड़ी सी भी फुर्सत मिलती हैं 
मेरे ख्वाब तुम बहुत याद आते हो. 
तुम मुझे  बहुत याद आते हो...  

Monday, April 29, 2013

मेरे हबीब.



कागज के पुर्जे जमा हो गए थे,  सोचा समेट के ब्लॉग पर डाल  दूँ . अकेलापन अपने से जुड़ने का अवसर देता हैं, और उसी जुड़ने मे कुछ गहरे भाव उठते हैं, दर्द से भीग कर जन्म होता हैं शब्दो का, और कभी कभी शब्द आज़ाद करते हैं, हल्का करते हैं, बहुत कुछ बह जाता हैं.  उन शब्दो के जन्म होता हैं, कविता का. तो कवि भी किन्ही अर्थो मे माँ होता हैं. अलग अलग समय पर उतरे भाव यहा समेट रख रहा हूँ.

समन्दर, बाहर का, खबर देता हैं,
अन्दर भी एक सागर है।
वर्ना क्यों किसी झंझावत में,
बहता आँखों का नीर,
खारा लगता है।

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कुछ इन्सा समंदर होते हैं,
बाहर नही जीतने अंदर होते हैं.
इनकी गहराइयो की ठोर मुश्किल हैं.
खुद को जीतते हैं, सिकंदर होते हैं.

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तेरी आँखों- से, अब वो समंदर नहीं मिलते।
पीने वालो को, अब वो मंजर नहीं मिलते।
इस भागती - दोड़ती जिन्दंगी में, इश्क?
कभी तुम नहीं मिलते, कभी हम नहीं मिलते।

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इश्क जुनूं से जो किया,काम आता हैं
तेरे जिक्र में, अब मेरा भी नाम आता हैं
तू कितना भी छुपा, ज़माने से,ऐ हबीब
तेरी झुकी आँखों से,इक सलाम आता है.

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अपने पे इतना यूँ न इतरा, एक जवानी, हम भी रखते है।
चुप रहते हैं तो क्या। इश्क की, एक कहानी हम भी रखते है।
हर चीज को चौराहों पर खड़ा नहीं किया जाता, मेरे दोस्त।
आँखों में वरना, समंदर सा पानी, हम भी रखते है।


Friday, March 29, 2013

मेरे आंसू - तेरे दोहे.


शुक्रगुजार हूँ, निदा साहब का। अलसुबह देखे एक ख्वाब का, सुबह पानी पिने आई गौरेया का। सुबह से ही सावन बरस रहा हैं। और रिमझिम नहीं, धुआधार बरस रहा हैं। बाबा कबीर कह ही गए हैं, "कबहि कहु जो मैं किया, तू ही था मुझ माहि।" तो कुछ दोहे भी कागज पर स्याह बन उतर आये।
दर्द और आंसुओ का अस्तित्व से सीधा संवाद होता हैं। कोई मीडिएटर नहीं चाहिए। लेकिन उसके लिए एक गहरी सवेंदंशिलता चाहिए। आज सवेंदना सरस्वती के सामान सुख गई हैं, और इश्वर मर चूका हैं, का उदघोष-सन्देश समाज साफ साफ़ दे रहा हैं। तो बात सीधी हैं, अब उसे किसी बोद्धिक सम्भोग की चाह में , जटिल किया जाये, तो परिणाम भी अनसुलझा छिन्न भिन्न समाज होगा।

खैर। फिर से शुक्रिया, उन बादलो का जो सावन लेके आये।
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थोडा नमकीन पानी और फिर बची राख।
साहूकार ने लगाया, जब आदम का हिसाब।

हिसाब किताब में कब समाया तेरे मेरा प्यार।
साहूकार चूक गया, यादे - सांसे - वक्त- गर्मी - ख्वाब।

खुदा तेरी इक दुनिया हैं, एक मेरी भी दुनिया हैं।
तेरी दुनिया भय की, मेरा, प्यार रुआब।

किसने बनाये परिंदे, ये जंगल, जानवर, पानी।
किसी किसी आदम को ही मिलता, इन्सां का ख़िताब।

पीने वाले मधुशाला जाने, पढने वाले पढ़ पाते हैं,
एक खारा - खरा -गीला पन्ना, मेरी जीवन कोरी किताब।

थोडा नमकीन पानी और फिर बची राख।
साहूकार ने लगाया, जब आदम का हिसाब।

-आज इतना ही।

Monday, March 11, 2013

पानी केरा बुलबुला


निर्गम अनजान बीहड़ में कही
एक अनघड जंगली फ़ूल
सोचता हूँ कितनी होंगी
उसकी महत्वकांछाये!

अरबो की भीड़ में
मिटटी का पुतला, अदना इन्सान
अगले पल एक मांस पेशी धडकी
साँस आई और गई, तो जिया।
फिर भी कितने सपने
कितनी आकांछाये !

दोनों दो पल के।
फिर गिर जाना हैं।
आदम क्यों नहीं समझता
उसे भी जाना हैं।

विडम्बना ये हैं
मुरझाने से पहले
वो फूल तो खिलता हैं।
महकता हैं।
सार्थक होता हैं
किन्तु जाने से पहले
आदम, इन्सान नहीं बन पाता हैं।
दुसरे की आँखों से जीता
क्यों नहीं खिल पाता हैं।

नम पलके लिए, सोचता हूँ.
आदम, क्यों नहीं खिल पाता  हैं।

Wednesday, February 27, 2013

समय के दामन से कुछ कुछ मेरा सा। भाग - 1



पुरे 2 साल। और जहा रहा उस घर के सामने ही एक बोर्ड "ओशो समवेत ध्यान केंद्र ". रोज सोचता चल दू उस राह पर और पहूच जाऊ वहा . वर्ष 1993, उषानगर के उस घर की खिड़की से रोज, वह राह ताका करता था। ऐसा लगता था, वो निमंत्रण दे रही हैं।
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।

दादाजी की एक किताब ("समाजवाद से सावधान") ने तो ओशो से परिचय करीब 14 साल की  उम्र में करा दिया था। धार जिले के उस छोटे से गाँव में , मेरी अपनी छोटी सी दुनिया बसती थी। सामने पाठशाला, घर,मैदान, कुछ मित्र  और ढेर सारी किताबे, बस यही थी मेरी दुनिया। अचानक दादाजी का कुछ सामान देखते - संभालते समय, वो किताब मिली। लेखक/कथाकार  थे ओशो रजनीश। गलती से, पहला पन्ना पढ़ लिया, फिर क्या था। आखरी पन्ने तक कुछ सुध न रही। शायद उस उम्र में इतना आसान हुआ करता था, ध्यान में जाना।

खैर, उषानगर में हिम्मत न हुई तो मास्टर ने पुरे 6 साल बाद बुलाया। वर्ष 1999, बढ़ी हिम्मत करके बंशी ट्रेड सेण्टर पंहुचा। याद नहीं किससे मिला। उन्होंने शाम 8 बजे को ध्यान शिविर में आने को कहा। बहुत शर्मीला, शायद ही कुछ बोलने में यकीं रखने वाला, अपनी दुनिया अपनी मस्ती। ये था मैं तब। शर्मीलापन तो हद दर्जे का था। गाँव में कोई सहपाठी मित्र गर लड़की हैं और वो मिलने पहुच जाये, तो मैं पीछे दरवाजे से बाहर।  

खैर, तो मैं बात कर रहा था , मेरे प्रथम ध्यान शिविर से परिचय की। निश्चय किया, आज तो ध्यान शिविर में जाऊंगा ही। हिम्मत करके ध्यान हाल के बाहर पंहुचा भी। अन्दर देखा तो, दिल सीने से बाहर। ये जगह तो अपने लिए हैं ही नहीं बॉस। रंगीन प्रकाश में  नाचते, चीखते लड़के लडकिया। तौबा, उलटे पैर दौड़ लगाई। निचे आया तो पसीने पसीने था। जान बची तो लाखो पाए। लेकिन क्या पता था, लाखो लुटा के आया था।

ओशो ने दूसरी बार भी नहीं आने दिया, तैयार जो नहीं था। या पता नहीं, मेरा ही दुर्भाग्य।

और जब फिर आया पुरे 2 वर्ष बाद, तो जीवन ने अपनी पाठशाला में कड़वे पाठ पढ़ा दिए थे। वही मूल प्रश्न "To be or not to be" सामने था।...खैर बाकि बाते कभी बाद में। लेकिन देर तो हो ही गई थी।

आज इतना ही।

Sunday, January 27, 2013

तू या मैं?


रोज सबेरे मैं ही तो आता हूँ,
तभी तो होती हैं रौशनी
तुम्हारा अँधेरा हरता हैं।

ये तो तुम्हारी ही समस्या हैं,
तुम चले जाते हो
मंदिर मस्जिद में मुझे खोजने।

और मैं आता हूँ कई भेष लिए
तुम्हारे दरवाजे पर
खटखटाता भी हूँ।
पर तुम विचरते हो
किसी और माया -संसार में।

और फिर तुम नास्तिक बन जाते हो।
कहते हो कि "मैं" मर गया।
हाँ, मैं मरता हूँ हर गुजरे पल में।
लेकिन रहता हूँ, पैदा होता हूँ, हर नए ताजे पल में, मैं ही।

भूतो न भविष्यति।
मैं वर्तमान हूँ।
कुछ भी नाम दे दो मुझे।
मैं प्रार्थना ,मैं ही अजान हूँ।
गीता और कुरान हूँ।
नाद में "हूँ" मैं।
मैं ही अनाद में।
मैं प्रेम में।
नि:छल मुस्कान में।
खोजने की वस्तु नहीं, मैं।
जीने में मिलता हूँ।
मैं वो फ़ूल हूँ,
जहा तुम्हारा, "मैं" नहीं
वही खिलता हूँ।

जहा तुम्हारा "मैं" नहीं
वही खिलता हूँ।
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-आज इतना ही।