चलो यार, वापस शहादा चलते हैं।
उस बेफ्रिकी को, दिल फिर मचलते हैं।
वो मेरे हॉस्टल की दुनिया।
इस दुनिया से बेहतर ही थी।
पैसे नहीं थे , अहम भी नहीं था।
छोटे बड़े का वहम भी नहीं था।
सुबह कचोरी और शाम अंडा भुर्जी।
घूमना , भटकना , इश्क, अपनी मर्जी।
यार थे , दोस्त थे , चलो भाई साहब ही थे।
पर कोई अजनबी नहीं था।
कैसे बीता वो समय।
हाथ मलते हैं।
चलो यार, वापस शहादा चलते हैं।
उस बेफ्रिकी को, दिल फिर मचलते हैं।
- A poetry on my days in Shahada Engineering College.

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