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Save Humanity to Save Earth" - Read More Here

Saturday, July 12, 2014

सिकंदर चला गया.

जबसे लोगो की आँखों से, पानी चला गया.
बरसा नहीं बादल, खाली चला गया.

रहनुमा की उम्मीद में बैठे हैं सभी.
आया नही अभी तक, कहा चला गया?

वो बेफिक्री, वो आशिकी, वो पागलपन।
हर साँस थामा मगर,वो वक्त चला गया.

ये दौड़ हैं अंधी, एक खेल के मानिंद।
मजा क्या अब इसका, वो बच्चा चला गया.

तुझे नाज है, दौलत का, ठीक हैं नदीम।
देख, अभी-अभी, खाली हाथ, सिकंदर चला गया.

जबसे लोगो की आँखों से, पानी चला गया.
बरसा नहीं बादल, खाली चला गया.

आज इतना ही.
राहुल

Saturday, May 24, 2014

सब बच्चे लगे!

मुनव्वर जैसे बड़े शायरों को जब भी सुना, लिखे बिन रहा नहीं गया. ये वो पीर हैं जो सीधा उससे जोड़ते हैं. और जब आप उससे जुड़ते हैं तो, फिर आप, आप नहीं होते. वो ही होता हैं. समंदर से मिल कर बूँद की फिर क्या औकात।

उन्हों पलो वो होता हैं, जो एक हाड़ मांस का पुतला नहीं कर सकता। कुछ अनोखा, कुछ बिलकुल अनदेखा-अनसुना। बाकि सब नक़ल हैं, कूड़ा हैं.

कुछ नई पंक्तिया प्रस्तुत हैं.

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मुझ माझी को कब किनारे मिले
तुझ को भी क्या, मुझसे बेचारे मिले?
जिन आँखों से थी, मुझे मय दरकार,
रेगिस्ता वहा हज़ारो मिले।

मुझ माझी को कब किनारे मिले!
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मैं प्यासा ही रहा, मुझे समन्दर नसीब हुए.
वो पास रह कर भी, कब करीब हुए.
सब कहते हैं, उन्हें उनका प्यार मिला।
मेरे साथ ही क्या, ये किस्से अजीब हुए?
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उसके प्यार से खिलाये अधपके रोट, अच्छे लगे.
मेरा क़ातिल मुझ से बिछुड़ के रोया जो आज, आंसू उसके, सच्चे लगे.
दामन फैला के मैंने अपना, आसमां से जो देखा आज.
भीड़ में लड़ते-भागते , बड़े बड़े, सब बच्चे लगे.

बड़े बड़े, सब बच्चे लगे.

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आज इतना ही.

Saturday, May 10, 2014

मनुष्य मर रहा हैं.

भावनाओ को , कुछ अहसांसो को.
दे देता हैं, मानव, कोई  शब्द।
फिर घिसता जाता हैं उन्हे।
समय के पत्थर पर.

शब्द खोते जाते हैं, अर्थ अपना।
और साथ ही होती हैं दफ़न.
वो भावनाए, वो अहसास।

और हाड़ मांस का पुतला
बनता जाता है मशीन।
मशीन जिसे शब्दों कि सिर्फ़ ध्वनि पता है.
नहीं पता, उन्हें निभाने के मायने
उनके आगे पीछे छिपी, अहसांसो कि गर्माहट।
उनकी रूहानियत की खुशबू।

ईश्वर उदघोषणा करता सा लगता है.
"मनुष्य मर रहा हैं."

Friday, February 7, 2014

नए ज़माने

नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
सही-गलत छोड़, उन्हें मंजूर होते हैं..
वो तरक्कीपसंद कहलाते हैं, जो बेच देते हैं ज़मीर अपना।
सुना हैं आजकल वही हुजूर होते हैं...

नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
हम जैसो को कब मंजूर होते हैं.
ज़मीर जो बेचा, तो फिर क्या बचा.
हम अपनी सनक के लिए मशहूर होते हैं.

नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
हम जैसो को कब मंजूर होते हैं.