"

Save Humanity to Save Earth" - Read More Here


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Saturday, May 24, 2014

सब बच्चे लगे!

मुनव्वर जैसे बड़े शायरों को जब भी सुना, लिखे बिन रहा नहीं गया. ये वो पीर हैं जो सीधा उससे जोड़ते हैं. और जब आप उससे जुड़ते हैं तो, फिर आप, आप नहीं होते. वो ही होता हैं. समंदर से मिल कर बूँद की फिर क्या औकात।

उन्हों पलो वो होता हैं, जो एक हाड़ मांस का पुतला नहीं कर सकता। कुछ अनोखा, कुछ बिलकुल अनदेखा-अनसुना। बाकि सब नक़ल हैं, कूड़ा हैं.

कुछ नई पंक्तिया प्रस्तुत हैं.

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मुझ माझी को कब किनारे मिले
तुझ को भी क्या, मुझसे बेचारे मिले?
जिन आँखों से थी, मुझे मय दरकार,
रेगिस्ता वहा हज़ारो मिले।

मुझ माझी को कब किनारे मिले!
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मैं प्यासा ही रहा, मुझे समन्दर नसीब हुए.
वो पास रह कर भी, कब करीब हुए.
सब कहते हैं, उन्हें उनका प्यार मिला।
मेरे साथ ही क्या, ये किस्से अजीब हुए?
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उसके प्यार से खिलाये अधपके रोट, अच्छे लगे.
मेरा क़ातिल मुझ से बिछुड़ के रोया जो आज, आंसू उसके, सच्चे लगे.
दामन फैला के मैंने अपना, आसमां से जो देखा आज.
भीड़ में लड़ते-भागते , बड़े बड़े, सब बच्चे लगे.

बड़े बड़े, सब बच्चे लगे.

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आज इतना ही.

Saturday, May 10, 2014

मनुष्य मर रहा हैं.

भावनाओ को , कुछ अहसांसो को.
दे देता हैं, मानव, कोई  शब्द।
फिर घिसता जाता हैं उन्हे।
समय के पत्थर पर.

शब्द खोते जाते हैं, अर्थ अपना।
और साथ ही होती हैं दफ़न.
वो भावनाए, वो अहसास।

और हाड़ मांस का पुतला
बनता जाता है मशीन।
मशीन जिसे शब्दों कि सिर्फ़ ध्वनि पता है.
नहीं पता, उन्हें निभाने के मायने
उनके आगे पीछे छिपी, अहसांसो कि गर्माहट।
उनकी रूहानियत की खुशबू।

ईश्वर उदघोषणा करता सा लगता है.
"मनुष्य मर रहा हैं."

Friday, February 7, 2014

नए ज़माने

नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
सही-गलत छोड़, उन्हें मंजूर होते हैं..
वो तरक्कीपसंद कहलाते हैं, जो बेच देते हैं ज़मीर अपना।
सुना हैं आजकल वही हुजूर होते हैं...

नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
हम जैसो को कब मंजूर होते हैं.
ज़मीर जो बेचा, तो फिर क्या बचा.
हम अपनी सनक के लिए मशहूर होते हैं.

नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
हम जैसो को कब मंजूर होते हैं.

Tuesday, December 31, 2013

फ़ारूक शेख: ठहराव और संजीदगी.

"फिर छिड़ी रात बात फूलों की" । रेडियो पर सायमा RJ Sayema ने जब ये गाना बजाया, मेरे तो सारे तार बज से गए.।
फारूक साहब चले गए. उनकी अदायगी एक ठहराव देती थी. मानो समय इसी पल में जम गया हो. आज तकनीक तो बहुत उन्नत हैं, लेकिन अदाकारों में एक जल्दीबाजी सी लगती हैं. एक दौड़ जो पहुचाती कही नहीं। सोने पे सुहागा मुहावरा अपना अर्थ पाता हैं, जब जगजीत & तलत अज़ीज़, फारूक के लिए गाते हैं। मानो एक ठहराव दूसरे कि तलाश में निकला था और वो पूरी हुई.

सायमा ने दीप्ती जी बात की. बहुत बहुत गहरी उदासी थी. जिंदगी का आधा हिस्सा अचानक अलग हो जाये, तो फिर आधे बचे का क्या वजूद। बातो के दौरान ही यह बात निकल कर आई कि, फारूक साहब को पोएट्री , उर्दू शायरी का काफी शौक था. और इसे मै साहित्य & समाज की बहुत बड़ी  क्षति कहूंगा कि, फारूक साहब शायरी पर ही एक बहुत खूबसूरत प्रोग्राम लेकर आने वाले थे. और ख़ुदा से ये गुनाह हो गया.

वो संजीदगी, ठहराव, एक तीव्र गहरापन। जिंदगी अपने मायने पाती थी और इसीलिए मासूमियत, भोलापन, सहजता & स्नेह के दैवीय गुण तब के इंसानो में होते थे. अब? बोन्साई, उथलापन, भीड़ & एक अंधी दौड़. सब दौड़ रहे, पहुच कोई नहीं रहा.

ख़ुदा उन्हें जन्नत नसीब करे.उस "ठहराव" को सुनते हैं.

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फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात हैं या बरात फूलों की

फुल के हार, फुल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की

आप का साथ, साथ फूलों का
आप की बात, बात फूलों की

फुल खिलते रहेंगे दुनियाँ में
रोज निकलेगी, बात फूलों की

नज़ारे मिलती है, जाम मिलते है
मिल रही है, हयात फूलों की

ये महकती हुयी गज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में, रात फूलों की


Saturday, August 10, 2013

मेरी कविता, मेरा परिचय.

कुछ आस, कुछ निरास,
कुछ बुझी, बुझी सी प्यास,
कुछ विश्वासों के ढहने की टीस,
कुछ, न मिल पाने की खीज।
कुछ खुशबू, कुछ काटे
कुछ दूसरो से मिले, कुछ अपनों ने भी बांटे।
कुछ मेरी, कुछ तेरी कहानी
कुछ खरा - खारा सा पानी।
एक अनमने, मासूम बच्चे से दिल की
जीवन से आपाधापी।
मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।

मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।