नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
सही-गलत छोड़, उन्हें मंजूर होते हैं..
वो तरक्कीपसंद कहलाते हैं, जो बेच देते हैं ज़मीर अपना।
सुना हैं आजकल वही हुजूर होते हैं...
नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
हम जैसो को कब मंजूर होते हैं.
ज़मीर जो बेचा, तो फिर क्या बचा.
हम अपनी सनक के लिए मशहूर होते हैं.
नए ज़माने के नए दस्तूर होते हैं..
हम जैसो को कब मंजूर होते हैं.
Friday, February 7, 2014
Tuesday, December 31, 2013
फ़ारूक शेख: ठहराव और संजीदगी.
"फिर छिड़ी रात बात फूलों की" । रेडियो पर सायमा RJ Sayema ने जब ये गाना बजाया, मेरे तो सारे तार बज से गए.।
फारूक साहब चले गए. उनकी अदायगी एक ठहराव देती थी. मानो समय इसी पल में जम गया हो. आज तकनीक तो बहुत उन्नत हैं, लेकिन अदाकारों में एक जल्दीबाजी सी लगती हैं. एक दौड़ जो पहुचाती कही नहीं। सोने पे सुहागा मुहावरा अपना अर्थ पाता हैं, जब जगजीत & तलत अज़ीज़, फारूक के लिए गाते हैं। मानो एक ठहराव दूसरे कि तलाश में निकला था और वो पूरी हुई.
सायमा ने दीप्ती जी बात की. बहुत बहुत गहरी उदासी थी. जिंदगी का आधा हिस्सा अचानक अलग हो जाये, तो फिर आधे बचे का क्या वजूद। बातो के दौरान ही यह बात निकल कर आई कि, फारूक साहब को पोएट्री , उर्दू शायरी का काफी शौक था. और इसे मै साहित्य & समाज की बहुत बड़ी क्षति कहूंगा कि, फारूक साहब शायरी पर ही एक बहुत खूबसूरत प्रोग्राम लेकर आने वाले थे. और ख़ुदा से ये गुनाह हो गया.
वो संजीदगी, ठहराव, एक तीव्र गहरापन। जिंदगी अपने मायने पाती थी और इसीलिए मासूमियत, भोलापन, सहजता & स्नेह के दैवीय गुण तब के इंसानो में होते थे. अब? बोन्साई, उथलापन, भीड़ & एक अंधी दौड़. सब दौड़ रहे, पहुच कोई नहीं रहा.
ख़ुदा उन्हें जन्नत नसीब करे.उस "ठहराव" को सुनते हैं.
****************************************
फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात हैं या बरात फूलों की
फुल के हार, फुल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की
आप का साथ, साथ फूलों का
आप की बात, बात फूलों की
फुल खिलते रहेंगे दुनियाँ में
रोज निकलेगी, बात फूलों की
नज़ारे मिलती है, जाम मिलते है
मिल रही है, हयात फूलों की
ये महकती हुयी गज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में, रात फूलों की
फारूक साहब चले गए. उनकी अदायगी एक ठहराव देती थी. मानो समय इसी पल में जम गया हो. आज तकनीक तो बहुत उन्नत हैं, लेकिन अदाकारों में एक जल्दीबाजी सी लगती हैं. एक दौड़ जो पहुचाती कही नहीं। सोने पे सुहागा मुहावरा अपना अर्थ पाता हैं, जब जगजीत & तलत अज़ीज़, फारूक के लिए गाते हैं। मानो एक ठहराव दूसरे कि तलाश में निकला था और वो पूरी हुई.
सायमा ने दीप्ती जी बात की. बहुत बहुत गहरी उदासी थी. जिंदगी का आधा हिस्सा अचानक अलग हो जाये, तो फिर आधे बचे का क्या वजूद। बातो के दौरान ही यह बात निकल कर आई कि, फारूक साहब को पोएट्री , उर्दू शायरी का काफी शौक था. और इसे मै साहित्य & समाज की बहुत बड़ी क्षति कहूंगा कि, फारूक साहब शायरी पर ही एक बहुत खूबसूरत प्रोग्राम लेकर आने वाले थे. और ख़ुदा से ये गुनाह हो गया.
वो संजीदगी, ठहराव, एक तीव्र गहरापन। जिंदगी अपने मायने पाती थी और इसीलिए मासूमियत, भोलापन, सहजता & स्नेह के दैवीय गुण तब के इंसानो में होते थे. अब? बोन्साई, उथलापन, भीड़ & एक अंधी दौड़. सब दौड़ रहे, पहुच कोई नहीं रहा.
ख़ुदा उन्हें जन्नत नसीब करे.उस "ठहराव" को सुनते हैं.
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फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात हैं या बरात फूलों की
फुल के हार, फुल के गजरे
शाम फूलों की, रात फूलों की
आप का साथ, साथ फूलों का
आप की बात, बात फूलों की
फुल खिलते रहेंगे दुनियाँ में
रोज निकलेगी, बात फूलों की
नज़ारे मिलती है, जाम मिलते है
मिल रही है, हयात फूलों की
ये महकती हुयी गज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में, रात फूलों की
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Saturday, August 10, 2013
मेरी कविता, मेरा परिचय.
कुछ आस, कुछ निरास,
कुछ बुझी, बुझी सी प्यास,
कुछ विश्वासों के ढहने की टीस,
कुछ, न मिल पाने की खीज।
कुछ खुशबू, कुछ काटे
कुछ दूसरो से मिले, कुछ अपनों ने भी बांटे।
कुछ मेरी, कुछ तेरी कहानी
कुछ खरा - खारा सा पानी।
एक अनमने, मासूम बच्चे से दिल की
जीवन से आपाधापी।
मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।
मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।
कुछ बुझी, बुझी सी प्यास,
कुछ विश्वासों के ढहने की टीस,
कुछ, न मिल पाने की खीज।
कुछ खुशबू, कुछ काटे
कुछ दूसरो से मिले, कुछ अपनों ने भी बांटे।
कुछ मेरी, कुछ तेरी कहानी
कुछ खरा - खारा सा पानी।
एक अनमने, मासूम बच्चे से दिल की
जीवन से आपाधापी।
मेरी कविता, मेरा परिचय,
मेरी आपबीती।
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मेरी आपबीती।
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Monday, June 24, 2013
मेरे ख्वाब.
तुझे देखता रहू ,
या सांसो की डोर थामे रहु.
न देखा, तो क्या जी पाउँगा।
देखता रहा, सांसे न ले पाउँगा।
कौन है तु.
तू शायद, अलसुबह देखा ख्वाब हैं,
जो इतना सच्चा लगता हैं
कि साँसे रोक देता हैं।
लगता है वही जीना, जीने लायक हैं।
लेकिन जब टूटता है,
तो फिर साँसे रोक देता हैं।
फिर भी मैं, अपने अन्दर के बच्चे को समझाता हूँ.
ख्वाब एक ख्वाब ही तो है.
ख्वाब ही रहा होगा।
और जीते चला जाता हूँ।
बहता और बीतता रहता हूँ।
लेकिन जब कभी थोड़ी सी भी फुर्सत मिलती हैं
मेरे ख्वाब तुम बहुत याद आते हो.
तुम मुझे बहुत याद आते हो...
या सांसो की डोर थामे रहु.
न देखा, तो क्या जी पाउँगा।
देखता रहा, सांसे न ले पाउँगा।
कौन है तु.
तू शायद, अलसुबह देखा ख्वाब हैं,
जो इतना सच्चा लगता हैं
कि साँसे रोक देता हैं।
लगता है वही जीना, जीने लायक हैं।
लेकिन जब टूटता है,
तो फिर साँसे रोक देता हैं।
फिर भी मैं, अपने अन्दर के बच्चे को समझाता हूँ.
ख्वाब एक ख्वाब ही तो है.
ख्वाब ही रहा होगा।
और जीते चला जाता हूँ।
बहता और बीतता रहता हूँ।
लेकिन जब कभी थोड़ी सी भी फुर्सत मिलती हैं
मेरे ख्वाब तुम बहुत याद आते हो.
तुम मुझे बहुत याद आते हो...
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Monday, April 29, 2013
मेरे हबीब.
कागज के पुर्जे जमा हो गए थे, सोचा समेट के ब्लॉग पर डाल दूँ . अकेलापन अपने से जुड़ने का अवसर देता हैं, और उसी जुड़ने मे कुछ गहरे भाव उठते हैं, दर्द से भीग कर जन्म होता हैं शब्दो का, और कभी कभी शब्द आज़ाद करते हैं, हल्का करते हैं, बहुत कुछ बह जाता हैं. उन शब्दो के जन्म होता हैं, कविता का. तो कवि भी किन्ही अर्थो मे माँ होता हैं. अलग अलग समय पर उतरे भाव यहा समेट रख रहा हूँ.
समन्दर, बाहर का, खबर देता हैं,
अन्दर भी एक सागर है।
वर्ना क्यों किसी झंझावत में,
बहता आँखों का नीर,
खारा लगता है।
***************************************
कुछ इन्सा समंदर होते हैं,
बाहर नही जीतने अंदर होते हैं.
इनकी गहराइयो की ठोर मुश्किल हैं.
खुद को जीतते हैं, सिकंदर होते हैं.
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तेरी आँखों- से, अब वो समंदर नहीं मिलते।
पीने वालो को, अब वो मंजर नहीं मिलते।
इस भागती - दोड़ती जिन्दंगी में, इश्क?
कभी तुम नहीं मिलते, कभी हम नहीं मिलते।
***************************************
इश्क जुनूं से जो किया,काम आता हैं
तेरे जिक्र में, अब मेरा भी नाम आता हैं
तू कितना भी छुपा, ज़माने से,ऐ हबीब
तेरी झुकी आँखों से,इक सलाम आता है.
***************************************
अपने पे इतना यूँ न इतरा, एक जवानी, हम भी रखते है।
चुप रहते हैं तो क्या। इश्क की, एक कहानी हम भी रखते है।
हर चीज को चौराहों पर खड़ा नहीं किया जाता, मेरे दोस्त।
आँखों में वरना, समंदर सा पानी, हम भी रखते है।
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