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Sunday, April 29, 2012

बसंत के मायने: तब और अब.

बसंत के मायने क्या वक्त और स्थान बदल देता हैं? कभी किसी मासूम  उम्र में, फूलों की सुवास प्रिय से आती लगती हैं., और अब पतझड़ की चिंता उस सुगंध  को आत्मा तक नहीं पहुचने देती, और टेसू के फूल का रंग, परिस्थितियों से संघर्ष और उससे उपजी बेबसी से बरसते खून के आंसू से सुर्ख लाल प्रतीत होता हैं..इंसानों में रीतता आँखों का पानी और गिरता जल स्तर, कही कोई सम्बन्ध हैं? पता नहीं. आज व्यवस्था बहुत बड़ी हो चुकी हैं, और इन्सान अदना. व्यवस्था भूल गयी कि उसे इस सामान्य इन्सान के लिए ही बनाया गया हैं, और नियमो के निम्नतर अर्थो  में उलझी हैं. वही अदने इन्सान ने भी वक्त के साथ अपने वजूद को बेच पेट भरने का निश्चय कर लिया हैं. दोनों अपना अर्थ खो रहे हैं, और किसी बोस, सरदार, गाँधी का इंतजार व्यर्थ हैं, क्योकि उन्हें आँखों के पानी वाले इन्सान मिले थे. निराश तो हूँ, लेकिन क्या करू, ब्लड ग्रुप बी+ मिला हैं, तो खून के साथ न्याय जरूर करूँगा. मेरी अदनी सी कोशिश और प्रयोग जारी हैं, पिछले बरस "सच बोलने का प्रण लिया था", और बहुत जूते पड़े थे. Dell कार्नेगी आज भी मौंजू हैं (तारीफ करो और काम निकालो)  और सत्य पराजित. क्योकि सत्य आज outdated हैं, ओल्ड fashioned हैं, झूठ और फरेब, आज के नए बिज़नस मंत्रा हैं. हर कोई एक दुसरे को गंजा समझ, कंघा बेचने में, अपना सब कुछ बेच चूका हैं जो अमूल्य था और सिकन्दर को भूल गया हैं, जिसने अपनी अंतिम यात्रा मैं, खाली हाथ बाहर रखवाए थे...जब सिकंदर भी खाली हाथ गया......तो ....
खैर वक्त के उस दौर कि कुछ पंक्तिया याद आ रही थी, तो सोचा इस मौन को तोडा जाये, जो मेरी इस बरस का प्रण हैं. मौन, लेकिन सार्थक मौन, ख़ामोशी नहीं जो इस देश के सरदार ने अख्तियार कर बेडागर्क  कर दिया हैं. और एक अधेड़ होता इन्सान जिसके पास  देश को परिवर्तित  का पॉवर हैं, किन्तु अपने को किसी प्रदेश  में साबित करने के अपनी जिद के पीछे , देश का इतना मूल्यवान समय जाया कर रहा हैं. 

खैर..अब उस बसंत को याद किया जाये, जब जमाना, पैरो कि ठोकर पे रहता था..और हम, हम आसमां में.:-)
_____________प्यार एक मौन.____________________________________________
हर पल तेरी यांदो का साया साथ हैं.
करू भले ही इंकार, लेकिन कुछ  बात हैं.
वरना क्यों हो जाता हूँ खामोश मैं, भरी महफ़िल में?
जब तेरा नाम किसी के लब से निकलता हैं.
वरना क्यों जब राह में, नहीं होता हैं तेरा साथ.
तो राह में पड़े पत्थरो, मैं पैरो से मारता चलता हूँ.
वरना क्यों, जब तू आती हैं सामने
तो ये दिल जोरो से धडकता हैं.
करना तो चाहता हूँ, हजारो बातें.
पर एक शब्द तक नहीं निकलता हैं.
कुछ बात हैं, हा जरूर कुछ बात हैं.
शब्द जिसे नहीं कर सकते अभिव्यक्त, वो ऐसी कुछ खास हैं.
शायद मौन ही उसकी अभिव्यक्ति का उपाय भला हैं.
जिसे हम-तुम ने प्यार नाम दिया हैं...
जिसे हम-तुम ने प्यार नाम दिया हैं............

आज इतना ही.

Sunday, December 11, 2011

प्रधानमंत्री बनाम बैंकर

कहानी मुझे लगता हैं सभी को बहुत पसंद होती हैं. शब्द कम, समझ ज्यादा. कठिन परिस्थतियो को भी सरलता से समझा और सुलझा सकती हैं कहानिया. वो हमारा साहित्य से पहला प्यार हैं. और पहला प्यार जीवन भर याद रहता हैं :-). चलिए वापिस आइये. ...तो कहानी हमारे पुरातन ज्ञान और विवेक को बड़ी सहजता पीढ़ी दर पीढ़ी ले जाती हैं. आज के न्यूक्लियर परिवार के बच्चे उनसे महरूम हैं. और अब सिर्फ एक अंतहीन दौड़ हैं लक्ष्मी के पीछे जो कही पहुचती नहीं.
खैर..एक कहानी पढ़ी खुशवंत सिंह के एक लेख में. मुझे उन्हें पढना अच्छा लगता हैं. दिल से और साफ - साफ. एक सरदार की तरह...विपिन बख्शी की अनुमति लेना चाहता हूँ, इस बहुत सार्थक और सामयिक कहानी को यहाँ अपने दोस्तों के साथ साँझा करने के लिए..चलिए सुनते हैं...एक जंगल में........................................:-)......
_____________________प्रधानमंत्री बनाम बैंकर _____________________________________

देश के प्रधानमंत्री अपना एक चेक भुनाने बैंक में गए। कैशियर के करीब जाकर उन्होंने कहा : ‘गुड मॉर्निंग मैडम, क्या आप यह चेक भुना सकती हैं?’ कैशियर ने कहा : ‘बड़ी खुशी से, सर? क्या आप मुझे अपना आईडी दिखाएंगे?’
प्रधानमंत्री हैरान रह गए। उन्होंने कहा : ‘देखिए मैडम, मैं अपने साथ अपना आईडी तो लाया नहीं हूं, क्योंकि मैंने सोचा भी न था कि मुझसे आईडी मांगा जाएगा। शायद आपने मुझे ठीक से पहचाना नहीं। मैं देश का प्रधानमंत्री हूं।’
कैशियर ने कहा : ‘जी सर, मैं आपको भलीभांति पहचानती हूं, लेकिन नियम-कायदों का तकाजा यही है कि आप मुझे अपना आईडी दिखाएं, नहीं तो मैं आपकी कोई मदद नहीं कर पाऊंगी।’
प्रधानमंत्री ने कहा : ‘मैडम, बैंक में इतने सारे लोग मौजूद हैं। सभी मुझसे पहचानते हैं। आप किसी से भी पूछ लीजिए। मेरी पहचान किसी से भी छुपी नहीं है।’
कैशियर ने कहा : ‘देखिए सर, आप मेरी बात ही समझ नहीं पा रहे हैं। सवाल पहचान का नहीं है। सवाल बैंक के नियमों का है। मैं नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकती।’
अब प्रधानमंत्री ने याचना की मुद्रा में कहा : ‘मैडम, मैं आपसे अनुरोध करता हूं। मुझे पैसों की सख्त जरूरत है।’
कैशियर ने कहा : ‘देखिए, आपको अपनी पहचान तो सिद्ध करना ही होगी। कुछ दिन पहले एक योगगुरु आए थे। अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए उन्हें कुछ योगासन करके दिखाना पड़े थे। फिर उसके बाद बाएं हाथ के एक धुरंधर बल्लेबाज आए थे। उन्हें अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए छह गेंदों पर छह छक्के लगाकर दिखाना पड़े थे। यदि आप भी अपनी पहचान सिद्ध कर पाएं तो हम आईडी के बिना भी आपको फौरन भुगतान कर देंगे।’
प्रधानमंत्री सोच में पड़ गए। थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा : ‘मैडमजी, देखिए मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है। मुझे बिलकुल भी अंदाजा नहीं है कि ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए।’
कैशियर ने कहा : ‘ठीक है, ठीक है। अब और कुछ कहने की जरूरत नहीं। इससे सिद्ध होता है कि आप ही देश के प्रधानमंत्री हैं। बताइए महोदय, आपको कितने पैसों की दरकार है?’

Note: With thanks to Dainik Bhaskar (source: http://goo.gl/dCzsI)

Saturday, October 29, 2011

ख़ुदा नहीं मिलता..

मुकद्दर में जो लिखा था, वो भी नहीं मिलता..
मंदिर में पत्थर हैं बैठा, मस्जिद में ख़ुदा नहीं मिलता...
मुकद्दर में जो लिखा था, वो भी अब नहीं मिलता..

ख़ुशी की तलाश में क्यों गम मिल जाता हैं?
सुना हैं अब दुश्मनों के जिक्र में, दोस्तों का नाम भी आता हैं.
निकलता हूँ मग़रिब को, जब भी घर से.
रास्ते में मुआ, मयखाना मिल जाता हैं.

लगाये तो थे बागीचे में, अबकी बरस कुछ गुलाब 'राहुल'
कांटे ही छिलते हैं, कोई फूल नहीं खिलता.

मुकद्दर में जो लिखा था, वो भी नहीं मिलता..
मंदिर में पत्थर हैं बैठा, मस्जिद में ख़ुदा नहीं मिलता..

हर पल सिलती बैचेनी का ये एहसास क्यों हैं.
समंदर के बाशिंदे को भी, इतनी प्यास क्यों हैं.
बरगद जिन्हें समझा था, बोनसाई निकल जाते हैं.
रिश्तो के भ्रम, अश्क बन बह जाते हैं.
फटेहाल, नंगे पैर ही सही, कुछ साथी हमेशा रहते थे.
बचपन के सुनहरे वो दिन याद आते हैं.

कसबे से दूर कही, तन्हा-गुमनाम बसर हम करते हैं.
सबके अपने मदीने हैं, कोई हमसफ़र नहीं मिलता.

मुकद्दर में जो लिखा था, वो भी नहीं मिलता..
मंदिर में पत्थर हैं बैठा, मस्जिद में अब ख़ुदा नहीं मिलता..

आज इतना ही.
राहुल..

*मग़रिब - शाम की नमाज

Tuesday, October 25, 2011

तमसो माँ ज्योतिर्गमय:

दीये के प्रकाश की किरण और मंत्रो की गूंज हमारे जीवन को खुशी और संतोष से भर दे.. ईश्वर हमें इतना सक्षम बनाये की हम बुद्ध के सन्देश "अप्प दीपो भव:को सार्थक करे और अपने आस पास के जीवन के अंधकार को हर ले.
दीप पर्व पर सभी को यही शुभकामनाये हैं.






आर्या-राहुल-निधि

Sunday, October 9, 2011

समुंद समाना बूंद में.


********समुंद समाना बूंद में.****************

बड़े गहरे अर्थ छुपे,छोटी छोटी बातों में.
दूर गगन के तारें दिखते, काली-गहरी रातों में.
बड़े गहरे अर्थ छुपे,छोटी छोटी बातों में.....

कौन कहता, कुछ नया.
क्या रहा कुछ अनकहा?
मतलब वही, सिर्फ शब्द नया.
बात सुनने की हैं, गुनने की हैं.
और मौन में मथने की हैं.
जिन्दंगी का ग़र समझा तो,
चुटकुले पे हँसने की हैं.
क्या गीता, क्या कुरान?
बहते सब, तेरे ही अहसासों में.

बड़े गहरे से अर्थ छुपे,छोटी छोटी बातों में.
दूर गगन के तारें दिखते, काली-गहरी रातों में....

आज इतना ही.
प्यार.
राहुल.