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Monday, May 10, 2010

ये बरस भी बरस ही गया.

ये बरस भी बरस ही गया. क्या भूलू, क्या याद करू. उम्र और वक़्त, ऐसे मक़ाम पर ले जा रही हैं, जहा पिरामिड में ऊपर और साथ, ज्यादा लोग नहीं बचे. गोया कि वो लोग जिनके सरमाये में, मैं खड़ा हो सकू. सब नीचे पिरामिड के लोग हैं जिन्हें बरगद के पेड़ तलाश हैं. आज बरगद के पेड़ का दर्द जान पाया हूँ. सब तो उसके नीचे खड़े हो सकते हैं., लेकिन वो कहा जाये. किससे कहे, कौन सुनेगा, और सुनता कौन हैं. उसकी बैचेनी, अब मेरी बैचेनी हैं. अकेले खड़े होने कि पीड़ा, अब महसूस हो रही हैं. परन्तु इतनी जल्दी होगी, सोचा ना था.
 पानी सिर्फ झीलों, नदियो से नहीं ख़त्म हो रहा हैं. आदमी कि आँखों का भी सुख रहा हैं. ग्लोबल वार्मिंग कही सिर्फ बाहर क़ी नहीं, भीतर क़ी समस्या भी हैं. भीतर क़ी शीतलता सुख गयी है. ये भीतर का मरुस्थल ही तो पेड़ो को काटता हैं, जानवरों को मारता हैं. इसी का दूसरा नाम धूर्तता हैं. धूर्त मानवीयता को मारता हैं.
वो कहते हैं "टाइगर बचाओ", मैं कहता हूँ "मानवीयता बचाओ". ये बच गयी, तो सब बच जायेगा. थोड़ी भीड़ कम करे, थोड़े मानवीय बने.  ताजे बने. जीवंत बने. होशपूर्ण बने.
मुझे लगता हैं, मूल समस्या ये हैं क़ी हमने बाकि सभी चीजो क़ी केंद्र बना लिया हैं और जीवन के मुलभुत तत्व जैसे मानवीयता, दया, प्यार को परिधि पर फेंक दिया हैं. जब तक मुलभुत तत्व जीवन जीने के केंद्र पर नहीं आते, समस्याएं जस क़ी तस ही रहेंगी.
अंत में अस्तित्व से सिर्फ यही प्रार्थना हैं क़ी, अब सिर्फ मानवों से मिलवाना. एक बरगद क़ी तलाश हैं. इस बरस उसकी छाव मिल जाये, इतना पूर्ण हैं. जीवन के केंद्र क़ी तलाश पूरी हो, अस्तित्व से यही प्रार्थना हैं. उस महाशुन्य क़ी कुछ झलक मिल जाये, फिर पूरण परमानन्द ही है. फिर कोई तलाश नहीं.
बीते बरस के लिए, आज इतना ही.

प्यार.

राहुल

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