अक्सर गॉव जाते है शहर
तलाशते है मकसद
भिड़ते लड़ते पीटते
खोते है खुद को
आहिस्ता आहिस्ता
मगर जब भी बारिशे
भिगोती है माटी को।
नम आँखों की बरसातों से
भीतर सौंधी खुशबु फिर महकती है।
गॉव फिर जिन्दा हो उठते है।
मेरे गॉव फिर जिन्दा हो उठते है।
Friday, March 16, 2018
Thursday, November 16, 2017
अलविदा : कुंवर नारायण
आज बहुत अच्छा पढ़ा,जिसे साहित्य कहते है, पढ़ा। कुंवर नारायण को पढ़ा।
अभिजात्यपन से फिर आंखे चार हुई। कुहासे के पीछे छुपा, वैभव फिर याद आया। नेत्र नम है।
अपने से परिचय एक गहरा संतृप्त अनुभव देता है। अभिजात्य साहित्य आपकी अंगुली पकड़ कर, बड़े मनुहाल से ले चलता है उस पार। जीवन के आपाधापी के टुच्चे पन को कही दूर फेककर , आत्मा उजास से भरती है।
अच्छा साहित्य एक उजास भरता है। कलंकित नहीं करता। जीवन ऊर्जा को उर्ध्व गति देता है.
ध्यान का गहरा अनुभव खुद की अनुपस्थिति से पैदा होता है।
आज इतना ही।
ओके मनीषा?
अभिजात्यपन से फिर आंखे चार हुई। कुहासे के पीछे छुपा, वैभव फिर याद आया। नेत्र नम है।
अपने से परिचय एक गहरा संतृप्त अनुभव देता है। अभिजात्य साहित्य आपकी अंगुली पकड़ कर, बड़े मनुहाल से ले चलता है उस पार। जीवन के आपाधापी के टुच्चे पन को कही दूर फेककर , आत्मा उजास से भरती है।
अच्छा साहित्य एक उजास भरता है। कलंकित नहीं करता। जीवन ऊर्जा को उर्ध्व गति देता है.
ध्यान का गहरा अनुभव खुद की अनुपस्थिति से पैदा होता है।
आज इतना ही।
ओके मनीषा?
Saturday, September 23, 2017
बूढ़ी होती जिन्दंगी
कभी जो थी सीने मे, आग,
वो अब पेट में धधकती हैं।
बूढ़ी होती जिन्दंगी,
कुछ यू रंग बदलती हैं।
कभी आँखों में आसमां समेटे थे हमने।
आज देह मेरी,
जमीं के टुकड़े को तरसती हैं।
कभी मौसमो के तूफान से
खेले थे हम।
आज ये आँखों से
सावन बरसती हैं।
बूढ़ी होती जिन्दंगी,
कुछ यू रंग बदलती हैं।
वो अब पेट में धधकती हैं।
बूढ़ी होती जिन्दंगी,
कुछ यू रंग बदलती हैं।
कभी आँखों में आसमां समेटे थे हमने।
आज देह मेरी,
जमीं के टुकड़े को तरसती हैं।
कभी मौसमो के तूफान से
खेले थे हम।
आज ये आँखों से
सावन बरसती हैं।
बूढ़ी होती जिन्दंगी,
कुछ यू रंग बदलती हैं।
Sunday, February 12, 2017
Tuesday, December 20, 2016
अनुपम मिश्र: साफ़ माथे वाले समाज की आवाज़।
एक हीरो वो होता हैं, जिसे दुनिया जानती हैं। एक वो, जो इस दुनिया को जानता हैं। आदमी को आदमी बनाने की एक पाठशाला, चली गई। अनुपम मिश्र चले गए। बहुत सोचता हूँ। ये भी की क्या, हमारी परेशानिया , हमारे चिंतन का दायर , हमारे व्यक्तित्व जैसा बोना हो गया हैं. हमारे चिंतन के दायरे घर और ऑफिस के बीच के सुविधा से परे नहीं जाते। सोचता हु, कब और कभी? क्या हम अपने नल और नालियो से उठकर , नदियों और तालाबो के बारे में सोच सकते हैं. अनुपम मिश्र को जब भी पढ़ता था, एक दिलासा वापस आता था। वो भरोसे की आवाज़ थे। ऐसी आवाज़ जो परेशान, उत्तेजित, आक्रोशित नहीं करती थी, छलावा नहीं करती थी. वरन शांत करती थी, दिलासा देती थी। वो हमारे अपने इतिहास की गूंज थे। वो इतिहास जो कभी पढ़ाया नहीं गया. वो इतिहास जिसे हासिये पे डाल दिया गया। पानी को जानने वाला एक समाज चला गया।
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