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Friday, March 12, 2021

गाँव

गाँव होने से मेरा मतलब 

नग्न निर्लल्ज सन्नाटे से नहीं था 

ही उसे ढकने के लिए 

सामूहिक शर्म डीजे के शोर से था 


गाँव होने का रूपक 

कभी धड़कन सुनाई देने वाली शांति हुआ करती थी 

तभी तो अंदर की आवाज़ साफ आती थी 

और वो साफगोईता 

नीम के पेड़ के निचे बैठे 

कड़कदार बूढ़े में झलकती थी। 


और उस शीतल शांति को 

कभी कोयल 

और चिरैया 

मधुर बनाती थी।

कानो में अमृत टपकता था 

ऐसे ही कोई 

९० -१०० साल नहीं जीता था 

गाँव में.


कभी गाँव में हम बसते थे 

अब ?

अब गाँव हमारी 

स्मृतियों में। 

2 comments:

  1. राहुल भाऊ खूप छान लिहितात तुम्ही👍👍👍👌👌👌👌

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  2. गाँव होने का रूपक
    कभी धड़कन सुनाई देने वाली शांति हुआ करती थी
    तभी तो अंदर की आवाज़ साफ आती थी
    और वो साफगोईता
    नीम के पेड़ के निचे बैठे
    कड़कदार बूढ़े में झलकती थी।

    बहुत सटीक
    अब गांव को भी नज़र शहर के लग गई

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