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Sunday, March 1, 2026

बेफ्रिकी

चलो यार, वापस शहादा चलते हैं। 

उस बेफ्रिकी को, दिल फिर मचलते हैं।

 

वो मेरे हॉस्टल की दुनिया।

इस दुनिया से बेहतर ही थी। 

पैसे नहीं थे , अहम भी नहीं था। 

छोटे बड़े का वहम भी नहीं था। 


सुबह  कचोरी और शाम अंडा भुर्जी। 

घूमना , भटकना , इश्क, अपनी मर्जी। 


यार थे , दोस्त थे , चलो भाई साहब ही थे। 

पर कोई अजनबी नहीं था। 


कैसे बीता वो समय। 

हाथ मलते हैं। 

चलो यार, वापस शहादा चलते हैं। 

उस बेफ्रिकी को, दिल फिर मचलते हैं। 



- A poetry on my days in Shahada Engineering College.