कब कोई कोरे पन्नो को पढ़ पाता हैं।
कब कोई ख़ामोशी को सुन पाता हैं।
शोरगुल , भीड़ और आपाधापी के बीच।
भीतर एक सन्नाटा हैं।
लिखते लिखते यु ही।
अश्क अक्सर ढल जाते हैं।
जीवन भागता रहता हैं।
क्या हम समझ पाते हैं.
-राहुल
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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (25-05-2015) को "जरूरी कितना जरूरी और कितनी मजबूरी" {चर्चा - 1986} पर भी होगी।
ReplyDelete--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
thanks Sir.
Deleteकम शब्दों में गहरी बात
ReplyDeleteThanks Rachana ji!
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