प्रीतिश नंदी के लेख (
एक नाकाम पिता) पढने के बाद, मन भारी सा हो गया था. आखिर दुखती रग पर हाथ जो रख दिया गया. जो कटु अनुभव उन्होंने बांटे, उन्ही से मैं भी बैचेन और आहत हूँ.
चिंतित हूँ, बाज़ार की बढ़ती ताकतों से और हैरान हूँ बड़े कदों की छुद्रता से. और ये नपुंसक बातें नहीं हैं मेरे कटु अनुभव हैं. शिखरों ने अपनी छुद्रता से सन्न किया हैं मुझे. कई अनुभव हैं. किस्से सुनाने का शायद यह सही वक्त नहीं होगा, लेकिन मैं एक ऐसे परिवार को जानता हूँ, जिसने मेरी और मेरे परिवार की हर मदद का प्रतिफल छुरा भोक कर किया. और यहाँ मैं ये भी बता दू की मैं किसी सड़क चलते की बात नहीं कर रहा हूँ. मैं बात कर रहा हूँ उस परिवार की जो अपने आप को सभ्य कहता हैं, शिक्षावान समझता हैं और परिवार का मुखिया एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे खासे ओहदे पर हैं. परन्तु मानवीयता के किसी गुण (दया, स्नेह, मदद, मासूमियत, दोस्ती, रिश्ते और उसकी गर्माहट.) पर पूरा परिवार भयानक रूप से गरीब हैं. गरीब कहना भी शायद किसी गरीब की बेज्जती होगी.क्योकि ये गरीबी बाहरी नहीं हैं, ये आन्तरिक हैं. निर्धन इन्सान को भी मैने किसी धनवान से अमीर पाया हैं. बहरहाल ये पूरा परिवार एक ही भाषा समझता हैं, जो आज बाज़ार की भाषा हैं. वो भाषा हैं- पैसो की भाषा.
मेरे संस्कार और अनुभव से परे लोग हैं ये. और मुझे आज भी ये समझने में दिक्कत होती हैं कि कोई कैसे मदद का प्रतिफल चांटा मार के कर सकता हैं? तो एक तरीके से मेरे लिए ये एक कल्चरल शॉक था. किन्तु दुःख कि और बात ये थी कि, वो अपने बच्चो को भी उनकी मासूमियत छीन कर वही घिनोनापन सिखा रहे हैं. और मेरी परेशानी ये होती हैं कि क्या मैं अपने बच्चो को भी वही मानवीय गुण सिखाऊ जो मैने अपने संसकारों में पाए थे, और जो अब व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं, क्योकि उन्हें भी तो वैसे ही लोगो का सामना कर पड़ सकता हैं जो वो परिवार तैयार कर रहा हैं. एक गहन बैचेनी अन्दर कही सिलती हैं. और किस्से कहू, सुनता कौन हैं.
बाज़ार कि ताकते पूरी तरह हावी हैं, और जो बिकता हैं, बस वही सही हैं. बस एक यही प्रतिमान बचा हैं, गलत और सही के भेद का अब तो.
एक कॉर्पोरेट ट्रेनिंग में था, ट्रेनर ने कहा: "गये वो दिन जब कोई चीज ईमानदारी होती थी". और मेरे अधिकतर साथी सहमत दिखे. ये शुन्यता देख निराशा हुई. "कुए में भांग वाली" वाली कहावत और किस्सा याद आता हैं. गोया कि अब दो ही चुनाव हैं, या तो "दर्द सहो और कोशिश करते रहो." रविंद्रनाथ के "एकला चलो रे" कि तरह, या फिर "पियो भांग और फिर शामिल हो जाओ छुद्रो और पागलो कि भीड़ में." फिर कोई दर्द नहीं हैं. लेकिन फिर कोई चुनाव भी नहीं हैं. फिर बाहर आने के सारे रास्ते बंद हैं या यूँ कहू कोई रास्ता हैं ही नहीं.
मेरा चुनाव साफ हैं.
अंत में विषय और मन को हल्का करते हुए, एक प्यारा सा SMS काफी दिनों से सहेज कर रखा हुआ था, शेयर करता हूँ. वक्त कि इस करवट जिसका जिक्र मैंने अभी किया हैं, के बारे में भी ये पंक्तिया कुछ कहती हैं. शायद पसंद आये क्योकि मेरे लिए मासूमियत और बचपन परमात्मा का ही रूप हैं, उस पर स्नेह आता ही हैं.
*********बचपन का जमाना होता था.*************
बचपन का जमाना होता था.
खुशियों का खजाना होता था.
चाहत चाँद को पाने की,
दिल तितली का दीवाना होता था.
खबर न थी कुछ सुबह की,
न शाम का ठिकाना होता था.
थक-हार के आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना होता था.
बारिश में कागज की कश्ती थी,
हर मौसम सुहाना होता था.
हर खेल में साथी होते थे,
हर रिश्ता निभाना होता था.
पापा की वो डांटे पड़ती,
पर मम्मी का मनाना होता था.
ग़म की जुबां ना होती थी,
ना जख्मो का पैमाना होता था.
रोने की वजह ना होती थी,
ना हँसने का बहाना होता था.
अब नहीं रही वो जिन्दंगी,
जैसा बचपन का जमाना होता था.
थैंक्स मयूरी पालीवाल, इस SMS को शेयर करने के लिए.
आज इतना ही.
प्यार.
राहुल.