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Thursday, March 18, 2010

आज फिर पीछे मुड़ देखता हूँ,

आज फिर पीछे मुड़ देखता हूँ,
यांदो के अँधेरे कमरे में कुछ टटोलता हूँ |
दिखाई देते है मुझे, कुछ चेहरे,
जिन्हें वक़्त धूँधलाना चाहता हैं |
पर कैसे भुला दू अपने ही अस्तितत्व के हिस्सों को,
और कैसे बताऊ इस भीड़ को, कि देखा है मैंने उन फरिश्तो को,
सोचता हूँ, रोता हूँ,
आज फिर पीछे मुड़ देखता हूँ,
यांदो के अँधेरे कमरे में कुछ टटोलता हूँ |...
.....................contd.next part soon....
@2010 Rahul Kumar Paliwal. Copy Right Protected. Do not publish without permission.

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