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Monday, April 29, 2013

मेरे हबीब.



कागज के पुर्जे जमा हो गए थे,  सोचा समेट के ब्लॉग पर डाल  दूँ . अकेलापन अपने से जुड़ने का अवसर देता हैं, और उसी जुड़ने मे कुछ गहरे भाव उठते हैं, दर्द से भीग कर जन्म होता हैं शब्दो का, और कभी कभी शब्द आज़ाद करते हैं, हल्का करते हैं, बहुत कुछ बह जाता हैं.  उन शब्दो के जन्म होता हैं, कविता का. तो कवि भी किन्ही अर्थो मे माँ होता हैं. अलग अलग समय पर उतरे भाव यहा समेट रख रहा हूँ.

समन्दर, बाहर का, खबर देता हैं,
अन्दर भी एक सागर है।
वर्ना क्यों किसी झंझावत में,
बहता आँखों का नीर,
खारा लगता है।

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कुछ इन्सा समंदर होते हैं,
बाहर नही जीतने अंदर होते हैं.
इनकी गहराइयो की ठोर मुश्किल हैं.
खुद को जीतते हैं, सिकंदर होते हैं.

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तेरी आँखों- से, अब वो समंदर नहीं मिलते।
पीने वालो को, अब वो मंजर नहीं मिलते।
इस भागती - दोड़ती जिन्दंगी में, इश्क?
कभी तुम नहीं मिलते, कभी हम नहीं मिलते।

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इश्क जुनूं से जो किया,काम आता हैं
तेरे जिक्र में, अब मेरा भी नाम आता हैं
तू कितना भी छुपा, ज़माने से,ऐ हबीब
तेरी झुकी आँखों से,इक सलाम आता है.

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अपने पे इतना यूँ न इतरा, एक जवानी, हम भी रखते है।
चुप रहते हैं तो क्या। इश्क की, एक कहानी हम भी रखते है।
हर चीज को चौराहों पर खड़ा नहीं किया जाता, मेरे दोस्त।
आँखों में वरना, समंदर सा पानी, हम भी रखते है।