"

Save Humanity to Save Earth" - Read More Here

Sunday, August 15, 2010

आजादी के मायने और असली आजादी.

 हिंदुस्तान एक आज़ाद मुल्क हैं. आखिर क्या हैं ये आज़ादी? हम कुछ भी करे, ये आज़ादी हैं? तो फिर हम आज़ाद हैं. हम वाकई कुछ भी करते हैं. सड़क चलते थूकते हैं. ट्रेन व् स्टेशन गंद्न्गी का साम्राज्य हैं. धर्मस्थल हमने पोलिथिंस से भर दिए हैं और उन्हें किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान में परिवर्तित कर दिया हैं. घर का सारा करकट कूचा पास बहती नदियो में डाल दिया हैं. देश की नसे, हमारी पवित्र नदियो को हमने नाले से भी बदतर बना दिया हैं. पास से गुजरते हुए नाक सिकोड़ना पड़ती हैं.
 
प्रोफेसनिलस्म के नाम पर हम सिर्फ धूर्त व्यवहार करना  सीख चुके हैं. और ये बीमारी सिर्फ महानगरो तक सिमित नहीं, छोटे-छोटे गाँव की बसाहट इससे अब अछूती नहीं रही. लोंगो के आदर्श अब हर रोज अपनी सुविधानुसार परिवर्तित होते हैं. असल बात ये हैं, अब हर जगह छुद्रता हावी हैं. कद बोने हो चुके हैं. कुछ समय पहले बोनसाई वृछ आये थे, अब बोनसाई व्यक्तित्व हैं. अपवादों की कमी नहीं, लेकिन उन्हें भी सिर्फ शिखंडी की तरह रक्छाकवच की तरह उपयोग किया जाता हैं, ताकि परदे के पीछे सारा खेल वही चलता रहे. देश का सत्यानाश करने की अगर बात करे, तो वाकई हम सब आज़ाद हैं.
 
ये जानते हुए भी की, अगला निशाना हम भी हो सकते हैं, हम अपने पड़ोसिओ की मुसीबत के वक्त गाँधी के बन्दर बन जाते हैं. सीधा पूछता हूँ यार, क्या आप अपने पडोसी पर विश्वास करते हैं? या वो आप पर करता हैं? क्या कर रहे हैं ये देखना हो तो किसी भी दिन का समाचार पत्र उठा के देख ले. 
एक अन्दर से कही किसी काहिलता, धुर्तपन ने जकड़ा हुआ हैं. या यु कहे हमारा धीरज, हमारा विवेक नापुशंकता की हद तक पहुच चूका हैं.
 
आज किसी आम आदमी की वो ओकात नहीं रही की वो कोई चुनाव जीतकर सत्ता के नशे में सोये हुए सत्तानशिनो को जगा पाए. उन्होंने पूरा बंदरबाट का इंतजाम किया हुआ हैं. साले, सब आपस में मिले हुए हैं. पूरा बंदोबस्त हैं इस बात का की आम आदमी इसी तरह घिसट-घिसट के जिए.
और लालच, धूर्तता का भी कही अंत नहीं, साले ब्लैक होल की तरह चूस रहे हैं. १०० करोड़, फिर १००० करोड़ चाहिए, फिर १०००० करोड़. कही अंत नहीं. वे भी आज़ाद हैं, लुटने, खसोटने को. हमें भी कुछ आज़ादी दे रखी हैं. मार दो इन्सान को नक्सलवाद के नाम पर. फेंक दो पत्थर अपनी ही सेना पर. तोड़-फोड़ दो सार्वजनिक संपत्ति अपनी भड़ास के निकालने के लिए. और गुस्सा बचा हो तो फेंक तो अपना जूता नेताओ पर. लेकिन फिर जियो वैसे हो घिसट कर. कीड़े की तरह. तुम्हे, "आम आदमी" इतनी ही आज़ादी हैं. जियो ऐसे ही.

तो आम आदमी भी आज़ाद हैं, नेता भी आज़ाद हैं, हिंदुस्तान भी.
फिर आखिर तेरी प्रॉब्लम क्या हैं, मुस्सदी.यह प्रशन सुन फिर नेपथ्य में चला जाता हु.

दुष्यंत फिर याद आते हैं....

मेरे सीने में नहीं तो तेरे  सीने में सही,
हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए.
सिर्फ हंगामे खड़े करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश हैं कि ये सूरत बदलनी चाहिए |

कुछ अपनी बची खुची अशाओ के साथ, आपको असली स्वातन्त्रय मिले, खोया हुआ विवेक मिले, ये शुभकामना करता हूँ.
प्यार,
राहुल 

Sunday, August 1, 2010

नई सुबह का इंतजार.

आज सुबह से अपनी पुरानी जर्जर डायरी के पेज पलट रहा था. गोया अपनी ही जिन्दंगी के बरस पलट रहा था. यांदो की जुगाली सिर्फ सन्डे को ही क्यों होती हैं. क्या हम और दिन विश्रांत होना खो चुके हैं? J.R.D  टाटा साहब को बहुत आदर और प्यार से याद करना चाहूँगा जो इस देश को "खुश" देखना चाहते थे बनाम के देश बहुत बड़ा आर्थिक शक्ति बने. क्या U.S.A.  के आज के हालात इस बारे में कुछ इशारा करते हैं? बहरहाल पारसी व्यक्तित्वों से अपना पुराना प्रेम मैं यहा भी नहीं छुपा पाया. यार, सच कहू. मुझे इन लोगो से प्यार हैं. बड़े गजब के प्यारे लोग हैं ये. इंसानी गुणों की खान. सच पूछो अगर दूसरा जन्म हो (जो मैं चाहता नहीं.) और अगर ईश्वर मुझसे पूछे तो मैं बिना किसी हिचक के पारसी बनना चाहूँगा. 
बहरहाल डायरी के तरफ फिर लौटता हूँ. कुछ पंक्तिया लिखी थी उम्र के उस मक़ाम पर जब मतिभ्रम की धुंध सचाई की किरणों को ढक लेती हैं (अठारह बरस). आज फ्रेंडशिप दिवस पर सोचा शायद वो प्रासंगिक हो, इसलिए यहाँ अभिव्यक्त करता हूँ. 
-----------------------------------------------------------------------
*****नई सुबह का इंतजार*****

पास बैठे यार से, किया जब ये सवाल,
क्यों दीखता हैं इन्सान, दुखी  और बेहाल.
क्यों मिलते हैं, गमदास और दुखीराम,
कहाँ गए यार वो, खुशहाल और सुखीराम.
दोस्त जो था चिंतामग्न, बड़ी गंभीरता से बोला,
और ये राज खोला.
बोला- यार, आज गम का फैशन हैं,
हर हँसने वाला पागल, बेशर्म हैं.
हँसाने वाला जब आज अख़बार पड़ता हैं,
तो चिंताए लिए निकलता हैं.
कोई मुस्कराता हैं तो दस टोक देंते हैं,
आज अपने ही अपनों की पीठ में छुरा भोंक देंते हैं.
मुस्कराने वाले से पूछा जाता हैं. "क्या बात हैं? बड़े खुश हो "?,
मानो उन्हें हंसी से परहेज हो.
फिर वे समस्याओ का वास्ता देते हैं,
गुंडागर्दी, हत्या, डकैती, भ्रष्टाचार का कहते हैं,
और इन दुखों के सागर में, उसे भी डुबो देते हैं.
इससे उसको, उससे उसको, यह संक्रामक बीमारी फैलती  जाती हैं,
ग़म बढता और हंसी घटती जाती हैं.
हर कोई नेता, अधिकारी ग़मगीन होना फैशन समझता हैं,
मानो जो जितना ग़मगीन,
काम के प्रति उतना गंभीर,
और उतना ही बड़ा चिन्तनशील.
ये चेहरे पर मुर्दानगी  लिए आते हैं,
खुद दुखी हैं, औरो को भी ग़म दे जाते हैं.
सरकार ने मुस्कराने वालो के लिए सी.बी.आई. और टाडा लगा रखा हैं,
ज्यादा हंसने वालो के लिए, पागलखाना बना रखा हैं.
हर इन्सान आज टूट चूका हैं,
अपनी रवानगी खो चूका हैं.
वह बन गया हैं केवल पैसा कमाने वाली मशीन,
रिश्ते-सवेंदनाये बहुत पीछे छोड़, हो गया हैं मानव से जिन्न.
दोस्त की ये बाते सुन मैं भी ग़म में डूबने लगा,
परन्तु अच्छा तैराक था इसलिए एक ठहाका लगा बच गया.
किन्तु गहरे में कही, दोस्त की इन बातों में सचाई थी,
सच कहने-सुनने  में, आखिर क्या बुराई थी.
सच ही तो हैं हम भूल गए हैं निश्छल हँसना,
हम छोड़ चुके हैं औरो के दिलो में बसना.
भगवन करे फिर दिन लौटे बहार के,
फिर कोई गाये तराने प्यार के,
छल छोड़ फिर आदमी मोहब्बत करे,
दिल के गागर को फिर प्यार से भरे,
हम न खोये अपनी आशाओ को,
क्यों न, नई सुबह का इंतजार करे.
क्यों न .................................

प्यार.
आज इतना ही.  
राहुल